अब एक नजर प्रतिद्वंदियों के ओर डालते हैं। दो प्रतिद्वंदी यदि आपस में लड़ रहे हों तो उसमे से जो वीर हो जो जीतने लायक हो उसे चाहिए की यदि वह क्षमा दान देकर आपस में समझौता कर लें तो उचित होता है। परन्तु अहंकार वस जो अपने से भी वीर पुरुष को धमका कर क्षमा करने की पुष्टि करता है वह अनुचित है क्योंकि क्षमा वीर को ही सोभा देती है। वीरता सिर्फ बाहुबल से ही नहीं आँकी जा सकती।
वीर का तो सबसे बड़ा लक्षण यह होता है कि वह धीर(धैर्यवान) होता है। इसके साथ साथ वह अपनी जगह पर अटल रहता है। वह अहंकार के वेग में लडखडाता नहीं। उसके चेहरे पर सदैव शान्ति का वास होता है। इसी प्रकार और भी कई लक्षण हैं वीर के।
जो भी हम लिखते हैं सब हमारे अपने विचार होते हैं। यदि किसी को कोई चीज बुरी लगे तो कृपया उस पर न ध्यान देकर अपने पात्र अच्छी चीजें ही ढूंढ़ लें। आपका प्रयास:- यदि आप हमारे लेखों को पढ़कर हमें और कुछ सुझाना चाहते हैं तो, टिप्पणी द्वारा अवश्य सुझाएं ! इस हेतु हम आपके आभारी रहेंगे, अनुरोध एवं चेतावनी:- यदि आप हमारी कृतियों पंक्तियों को कहीं पर भी सम्पादित करना चाहते हैं तो, आपको हमसे अनुमति लेनी होगी , क्योंकि ये सभी पंक्तियाँ रजिस्टर्ड एवं गूगल अथवा किसी भी सर्च इंजन में दृश्यमान हैं
रविवार, 8 दिसंबर 2013
उचित एवं अनुचित
शनिवार, 7 दिसंबर 2013
उचित एवं अनुचित
उचित और अनुचित एक दूसरे के परस्पर उलटे हैं। अर्थात ये एक दूसरे के विलोम शब्द हैं।
उचित:- कोई भी वस्तु या वाणी वहाँ उपयोग करना जहाँ उसका मुल्य हो ।
अनुचित:- कोई भी वस्तु या वाणी कभी भी कहीं भी उपयोग कर देना।
उचित और अनुचित पर प्रायः विद्वान लोग ही ध्यान देते हैं। इनके उचित एवं अनुचित इनके वेद-ग्रंथों द्वारा निर्धारित होते हैं। यहाँ उचित को "सुचारू" एवं अनुचित को "गलती" या "त्रुटी" भी कह सकते हैं। अब आप विद्वान का तात्पर्य तो समझ ही गए होंगे कि जो ज्ञानवान भी होता है। यद्यपि विद्या एवं ज्ञान में भी अंतर है ।
और जो विद्वान नहीं होते तथा बुद्धिमान एवं शक्तिशाली होते हैं, वे अपनी इच्छानुसार उचित और अनुचित का चुनाव कर लेते हैं परन्तु उसपर अटल भी रहते हैं।
इसी तरह जो भ्रमित बुद्धि वाला एवं शक्तिशाली होते हैं। वे अपनी प्रति/इच्छाओं को ही उचित मानते हैं। एवं उनके विरुद्ध जो भी हो सब अनुचित।
अब इसमें भी कई प्रकार हैं! जिनमे से हम कुछ प्रकारों का वर्णन करेंगे।
जैसे व्योहार कुशल व्यक्ति:-
हम जानते हैं की इस संसार में प्रत्येक प्राणी के पास प्रत्येक वस्तुएँ पुर्णतः नहीं होती हैं। कुछ पूर्ण होती हैं तो कुछ आंशिक मात्रा में परन्तु होती सब हैं। इसी तरह आप देखेंगे की किसी किसी व्यक्ति के पास ऐसी हुनर होती है की राह चलते चलते व्योहार स्थापित करते रहता है। इसे व्योहार कुशलता कहते हैं तथा ऐसे व्यक्ति व्योहार कुशल कहे जाते हैं। अब आप इन्हें यदि अपने दृष्टिकोण से देखेंगे तो आपको इनके अन्दर बहुत सारे अनुचितता मिलेगी। परन्तु वही उनके लिए उचित होता है। प्रायः इस संसार में उचित और अनुचित में ऐसा भी ज्यादातर भेद रहा है और रहेगा भी।
और जो व्योहार कुशल व्यक्ति होते हैं वे कोई बहुत ज्यादा ज्ञानी या बुद्धिमान भी नहीं होते। उनके अन्दर अकेलेपन की हमेशा एक प्रकार से डर छुपी रहती है। उनका मन हमेशा किसी न किसी का समर्थन चाहता है। इसी समर्थन और अकेलेपन को दूर करने की आस में अक्सर वे दूसरे का समर्थन करने को तत्पर रहते हैं। अब वह समर्थन वह किसे और क्यों दे रहे हैं इसका उन्हें जरा भी ज्ञान नहीं रहता जब वह अपने आप को अकेला महसूस करने लगते हैं। अर्थात ये तो शायद ही उचित और अनुचित का ध्यान देते हैं।
प्रशंगत: ------
बुधवार, 4 दिसंबर 2013
हर लो प्रभु मेरी अधियारी
हर लो प्रभु मेरी अंधियारी।।
हो तुम्हीं ज्ञान, विज्ञान तुम्हीं हो,
जग में बस सज्ञान तुम्हीं हो,
तुम्ही भक्त, भगवान तुम्हीं हो,
है लीला तुम्हरी जगत में न्यारी।।नित करते......अंधियारी।।
नहीं ध्यान है क्या अब ध्यावैं,
सारी विपदा किसे सुनावैं,
दृष्टि पड़े अब शरणागत पर,
जग के हो प्रभु तुम हितकारी।। नित करते.....अंधियारी।।
अपराध हुए जो अंधकार में,
हुईं जो त्रुटियाँ व्योहार में,
क्षमा करो प्रभु यह विनती है,
अब हर लो प्रभु मेरी अंधियारी।।नित करते.....अंधियारी।।
~~~~~~~~~जय श्री कृष्ण
दिनांक:- २८/११/२०१३
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
हर लो प्रभु मेरी अधियारी
हर लो प्रभु मेरी अंधियारी।।
हम क्या थे ये नहीं जानते,
आज भी कुछ हैं नहीं मानते,
सद्मार्ग प्रसस्त हो शरणागत का,
आज्ञा तुम्हारी सभी है प्यारी।।
दिव्यज्ञान से परिपूर्ण करो अब,
कलुष-भेद सब कूट करो अब,
तुम्ही विधा हो तुम्ही विधाता,
है महिमा तुम्हारी जगत में न्यारी।।
हो वही कर्म जो तुमको भावे,
जग में हम भी श्रेष्ठ कहावें,
उपकार तुम्हारा हम नित गावें,
तुम सुन लो प्रभु विलख हमारी।।
नित करते वंदन श्याम तुम्हारी,
हर लो प्रभु मेरी अधियारी।।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
दिनांक:- ०३/१०/२०१३
~~~~~~~~~APM
>>>>>>>>>जय श्री कृष्णा<<<<<<<<<
भगवान आनंदकंद प्रभु श्री कृष्ण जी के जन्मअष्टमी पर
भाग्योदय हुआ पृथ्वी का
की प्रभु मेरो आयो रे,
दसों दिशाएँ झूम उठी हैं
सारे जग में धूम मचायो रे।।
कंस का पलड़ा हुआ है भारी
दुखियारी बाकी नर-नारी
अलौकिक दीप जलायो रे,
दसों दिशाएँ झूम उठी हैं
सारे जग में धूम मचायो रे।।
कृष्ण ही कारण कृष्ण ही कर्ता
माध्यम और सर्व जग-भर्ता
पालनकर्ता मनु-वेस बनायो रे,
दसों दिशाएँ झूम उठी हैं,
सारे जग में धूम मचायो रे।।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
~~~~~~~~~APM
~~~~~~~~~Angira Prasad Maurya
~~~~~~~जय श्री कृष्णा~~~~~~~
~~~~~~~~~HARE KRISHNA~~~~~~~~~
जय हिन्द
जम के करते हैं प्रभुताई,
वोट दीजै प्रभु शरणागत को,
चरण पकड़ के करत दुहाई।।
सज्जन को तो राम राम की,
दुर्जन को व्हिस्की बड़े काम की,
लगता दुनियाँ के पालक हैं,
मदद वाहनों से धूमधाम की।।
वर पायो जब पंचवर्ष का,
नित देखो करते ठगड़ाई
हमहीं प्रभु हैं,हमहीं हैं दाता,
हस कर लेते हैं अंगड़ाई।।
मुझे तो लगता ये नहीं हैं मानव,
लक्षण से दिखते हैं दानव,
हिन्द सभ्यता टूट चुकी अब,
है परिवर्तित दानव में मानव।।
है दूषित इनकी काया देखो,
नित गर्भित भव-माया देखो,
कदम-कदम पर रिश्वत-खोरी,
था जाल यही बस साया देखो।।
"मौर्य" कहत प्रतिकार करो अब,
कल्कि रूप अवतार करो अब,
त्राहि-त्राहि है चाहँुदिश छायो,
हिन्द को तारमतार करो अब,
दिनांक~~~~~~~~~२७/११/२०१३
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
~~~~~~~~~APM
[साया - अल्प प्रभाव (पूर्ण प्रभाव सरेआम{प्रत्यक्ष} लूट-पाट या डकैती तो कर नहीं पाएंगे। अतः इनकी आज्ञा के शिकार जो कार्यकर्ता कार्य करते हैं उनपर एवं उनके कार्य पर इन दुर्जनों की ही साया रहती है।
भ्रष्टों तुम्हारी कुटिलता बहुत हुई अब
हिन्द में रहते हो तो जय हिन्द मुस्कुराके कहो।।
लुट रहा है अमन-चमन की भूल नहीं पाओगे,
रो रहा व्योसायी तो तुम ठहर नहीं पाओगे,
शंखनाद हुआ है की आज पश्चिम से,
पूरब से उदय होगा तो वहीँ पे जल जाओगे।।
तुमने बढ़ाये अत्याचार छुप के खेला खूब पिकोल,
टूटी तुम्हारी नहीं जुटेगी दमदार लगा लो फेविकोल,
सपूत हिन्द का समझ गया है पहन सको ना कोई चोल,
"मौर्य"अडिग है सत्य के पथ पर भले ही बदलो अपनी गोल।।
हिन्द विश्व का श्रेष्ठ संस्कृती इसे धूमिल ना होने देंगे,
मातृभूमि के रखवाले हम कभी इसे ना रोने देंगे,
"हिन्द सपूत" हैं लिए प्रतिज्ञा,हर शाम का बदला सबसे लेंगे,
कल लायेंगे नई सुबह फिर,पर रात्रि तुम्हें ना सोने देंगे।।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
०२/१०/२०१३
~~~~~~~~~APM
।।जय हिन्द।। वन्दे-मातरम।।
परम वीर भगत सिंह को कोटि-कोटि नमन।
ना पनपने देंगे विष व क्रूरता-अधम,
आओ आजादी को अपने बनाएँ सनम,
भगत सिंह तेरी बुलंदी को सत-सत नमन।।
घाव हैं हिन्द के तो तुम हो मरहम,
पाँव हैं हिन्द के तो तुम अगला कदम,
दुश्मन हैं निर्मम, बनो तुम भी जघन,
मिटा दो भ्रष्टता अब लाओ चमन।।
युवाओं तुम---------क्रूरता-अधम।।
घोष करो जय हिन्द का कि गूँजे गगन,
संतोष किये तो सूखे ये शांति-अमन,
सांप्रदायिक विवादों का कर दो दफ़न,
कि दुनियाँ का मिट जाए तुरत ही वहम।।
युवाओं तुम---------क्रूरता-अधम।।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
~~~~~~~~~APM
दिनांक:- २८/०९/२०१३
हिन्द के दामन में कुछ शब्द भर रहा हूँ
अपने भारत को सादर नमन कर रहा हूँ,
बंदूक तोप नहीं है हाथ में किंचिद मेरे,
पर शब्दों में वतन की झलक लिख रहा हूँ।।
यही वो भारत है धर्मियों का हिंदुस्तान,
आज की दुर्दशा जानता है सारा जहान,
आज बहुत हैं बने अधर्मियों के कारवां,
स्थिति पे मैं ऐसी रुदन कर रहा हूँ।।
हिन्द के....................लिख रहा हूँ।।
लिखा जाता है मोटे अक्षरों में भारत महान,
नित्य निकलती जा रही है अब इसकी जान,
जाने अब कब होगा भ्रष्टाचार से निदान,
ईश्वर की महिमा का किरण गिन रहा हूँ।।
हिन्द के....................... लिख रहा हूँ।।
~~~~~~~~~वन्दे-मातरम।।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
~~~~~~~~~APM
,
अपने भारत को सादर नमन कर रहा हूँ,
बंदूक तोप नहीं है हाथ में किंचिद मेरे,
पर शब्दों में वतन की झलक लिख रहा हूँ।।
यही वो भारत है धर्मियों का हिंदुस्तान,
आज की दुर्दशा जानता है सारा जहान,
आज बहुत हैं बने अधर्मियों के कारवां,
स्थिति पे मैं ऐसी रुदन कर रहा हूँ।।
हिन्द के....................लिख रहा हूँ।।
लिखा जाता है मोटे अक्षरों में भारत महान,
नित्य निकलती जा रही है अब इसकी जान,
जाने अब कब होगा भ्रष्टाचार से निदान,
ईश्वर की महिमा का किरण गिन रहा हूँ।।
हिन्द के....................... लिख रहा हूँ।।
~~~~~~~~~वन्दे-मातरम।।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
~~~~~~~~~APM
गुरुवार, 28 नवंबर 2013
अहंकार
अहंकार वह वास्तु या तत्व है जो अन्य सभी तत्वों को झूठा कर देता है। हम साधारण प्राणियों के लिए यह अकाट्य है। परन्तु ईश्वर की कृपा व उनकी चिकित्सा द्वारा इस पर विजय पाया जा सकता है। यह हर व्यक्ति के अन्दर वास करती है। इसे पूरा का पूरा जान पाना भी संभव नहीं है। जैसे- किसी को अपने विद्वता पर अहंकार होता है परन्तु वह इसे तत्वतः जान नहीं पाता क्योंकि लोग उसे विद्वान का श्रेय देते ही रहते हैं। श्रेय देने से उतना अहंकार नहीं उत्पन्न होता जितना की अपने से बड़े ज्ञानी का खुद में ही सत्यापन करके। वह औरों को पता हो ना हो परन्तु उसे अवश्य ही ज्ञात हो जाता है कि हम किसी से कम भी हैं ! जिसे श्रेय दिया जाता है। अब इस समय ऐसे व्यक्ति अनुशरण करने की आवश्यकता होती है, परन्तु अहंकार इतना प्रबल है कि उससे अनुकरण करवाने लगता है। जैसे ज्ञानी से भी बड़ा ज्ञानी बनने की विद्वता का प्रदर्शन।
यद्यपि अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। मेरे समझ से इसका पूरक अभिमान को भी कहा जा सकता है। जैसे ऋषियों मुनियों को भी अपने शक्ति एवं सिद्धियों पर बहुत अभिमान रहता था जबकि वो परम ज्ञानी रहते थे। उदहारण के लिए आप दुर्वाषा ऋषि को ही मान सकते हैं।
यहाँ तक की भगवान के बड़े-बड़े भक्तों में भी किंचिद अहंकार छुपा होता है। जैसे- अपने आप को ईश्वर का सबसे करीबी भक्त समझना। या अन्य लोगों को देख उनसे अपनी तुलना करना आदि।
यद्यपि हम इसके लक्षणों की विवेचना करें तो हमें बहुत सारे लक्षण प्राप्त होंगे। परन्तु इन लक्षणों को हम अपने अन्दर झाँक के नहीं देख पाते। जैसे- मै यह लेख लिख रहा हूँ और शेयर कर रहा हूँ। हमें ऐसा प्रतीत हो रहा है कि यह सबको ज्ञात नहीं है। हम बताएँगे तो लोग जानेंगे। इसी तरह अहंकार जो हमारा शत्रु है उसे हम स्वयं देख और उसका प्रतिकार नहीं कर पाते।
मै समझता हूँ कि यह केवल ईश्वर की ही चिकित्सा द्वारा संभव है की हम इससे पार पा सकें। जैसे किसी के सामने हमें सर झुकाने पर मजबूर कर देना। या किसी विशेष परिस्थिति में शक्तियों का आभाव कर देना आदि।
अब लेख बहुत बड़ा हो रहा है अतः इसे यहीं विराम देते हैं।
>>>>>>>जय श्री कृष्ण<<<<<<<
~~~~~~~~~APM
मंगलवार, 26 नवंबर 2013
प्रशंसा
जब कोई किसी की बड़ाई करता है तो उसे प्रशंसा कहते हैं। कुछ लोग तो स्वयं ही अपनी बड़ाई कर लेते हैं यह भी एक प्रशंसा है। परन्तु यह आत्मघाती भी है। जब कोई हमारी प्रशंसा करता है तो वह सत्य ही कहता है। किन्तु यदि स्वयं जो अपनी प्रशंसा करता है वह उसमे झूठे अलंकार भी लगाते रहता है। जिससे उसके अंतर में झूठ का प्रसार होने लगता है। और वह लोगों से अपनी बुराईयाँ छुपाकर उसे अच्छाइयों में परिवर्तित करते रहता है। परन्तु उसे इस बात की तनिक भी चिंता नहीं रहती कि वह क्या कर रहा है। उचित या अनुचित!!!!
>>>>>>>~~~~~~~~~<<<<<<<
इसी तरह से एक रईस और उसकी पत्नी थे । उन्हें इस चीज का अहंकार था कि वे बहुत भले लोग हैं। वे कभी दुसरे से दुर्व्योहर या दुराचार नहीं करते। और छोटी-छोटी बातों पर लोगों से सहानुभूति प्रकट करते। पति से ज्यादा पत्नी को अहंकार था। पति तो ज्यादातर अपने उद्द्योग में व्यस्त रहता था। फिर अब घर एवं बाहर के अन्य सभी कार्य पत्नी के ही माध्यम से ही होते थे। और उनकी पत्नी चतुर भी बहुत थी। अपनी प्रशंसा से वह अत्यंत प्रसन्न भी होती थी। एवं भले होने का अहंकार भी था। इन सब के साथ होने के कारण अब वह समझती थी कि जो वह करती है सब सही ही करती है।
कोई नहीं मिलता तो तमाम नौकरों के बीच ही अपनी प्रसंसा कर लेती। परन्तु े दुसरे की प्रसंसा कोई करे उसे यह सहन नहीं था। हाँ दूसरे से प्रसंसा पाने के लिए वह दूसरों की नगण्य प्रसंसा अवश्य कर दिया करती थी।
पति के सामने अपनी गलती ज्ञात होने पर वह उसे या तो छुपाने का प्रयास करती या तो कोई और बहाने लेकर हठपूर्वक पति को कटुभास कहती। पति समझदार भी था इसलिए वह चुप हो जाया करता था। अब वह इसी तरह जब बच्चे बड़े हो गए तब पति को दफ्तर में भी सहायता करने लगी।
वह यह समझती कि वह अपनेआप में बहुतकुछ है।
दिनांक:-27/11/2013
~~~~~~~~~Angira Prasad Maurya
प्रसंगतः-
शनिवार, 2 नवंबर 2013
शुभ-दीपावली
ॐ श्री राधेगोविन्दाय नमः
*******
परम्पराएँ तो बहुत हैं हिन्द में,
इसे प्रेम-प्रकाश पर्व मानों तुम।
मिलेंगी गाथाएँ भी बहुत हिन्द में,
इसे उनका उदय ही जानों तुम।
मिटती सारी कटुताएं इस दिन,
इसे हिन्द की विजय जानों तुम।
छोड़ दो छल की मिलावट,
अन्तः प्रकाश को भी जानों तुम।
अस्तित्व यहीं से है जगत का,
प्रतिज्ञा है हिन्द की ये मानों तुम।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
~~~~~~~~~APM
दिनाँक:- ०३/११/२०१३
गुरुवार, 26 सितंबर 2013
प्रकाश एवं सत्य युक्त चरित्र में भी बँधाए आती हैं क्योंकि ऐसे चरित्र का विकास एवं दृढ़ता इसी में निहित होता है:-
कभी कभी पल ऐसा आ जाता है,
खुशहाल-जिंदगी झुठला जाता है,
है कभी कभी वह वक्त भी आता,
परेसाँ-जिंदगी को धुंधला जाता है।।
बनना चाहूँ चाँद के जैसा,
घना-अँधेरा भी सरमा जाता है,
खुश रहकर करता उजियाला,
पक्ष भी दूजा आ जाता है।।
कभी कभी......... धुंधला जाता है।।
बनना चाहूँ सूर्य के जैसा,
उजियाला जिससे छा जाता है,
इतने में फिर आती संध्या,
जब रात्रि-अँधेरा मौका पाता है।।
कभी कभी......... धुंधला जाता है।।
सत्य-सहारे चलते हैं हम,
सच है की डगमगा जाता है,
"मौर्य" चलूँगा सत्य के पथ पर,
जहँ छेद कभी ना हो पाता है।।
कभी कभी......... धुधला जाता है।।
दिन होता है,है रात भी होनी,
प्राणी इससे अनुभव पाता है,
अस्तित्व नहीं है अंधकार का,
प्रकाश कहाँ ये ढक पाता है।।
कभी कभी......... धुंधला जाता है।।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
~~~~~~~~~APM
दिनांक:- २६/०९/२०१३
शुक्रवार, 20 सितंबर 2013
सनातन सभ्यता के हित में दो शब्द
सनातन सभ्यता को आज विभक्त कर नियमों को धर्म कहा जाता है। आज अन्य धर्म कहते हैं चलो हमारे साथ पकड़ के हाथ, जबकि सनातन सभ्यता के नियम आज भी वही कहते हैं-मानवता रखो, सदाचारी बनो, जगत-हितकारी बनो,ना की दुराचारी बनो, परोपकारी बनो, सज्जन बनो व्योहारिक बनो आदि बहुत नियम हैं जैसे ये भी कि अपने से बड़ों का इज्ज़त करना हमारा धर्म है।।
~~~~~~~~~APM
तो गर्व से कहो हम हिन्दू हैं।---हिन्द गौरव---
।।जय हिन्द।।वन्दे-मातरम।।
बुधवार, 28 अगस्त 2013
||ॐ|| जय श्री कृष्णा ||ॐ||
भाग्योदय हुआ पृथ्वी का
की प्रभु मेरो आयो रे,
दसों दिशाएँ झूम उठी हैं
सारे जग में धूम मचायो रे।।
कंस का पलड़ा हुआ है भारी
दुखियारी बाकी नर-नारी
अलौकिक दीप जलायो रे,
दसों दिशाएँ झूम उठी हैं
सारे जग में धूम मचायो रे।।
कृष्ण ही कारण कृष्ण ही कर्ता
माध्यम और सर्व जग-भर्ता
पालनकर्ता मनु-वेस बनायो रे,
दसों दिशाएँ झूम उठी हैं,
सारे जग में धूम मचायो रे।।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
~~~~~~~~~APM
~~~~~~~~~Angira Prasad Maurya
~~~~~~~जय श्री कृष्णा~~~~~~~
~~~~~~~~~HARE KRISHNA~~~~~~~~~
रविवार, 25 अगस्त 2013
रविवार, 4 अगस्त 2013
प्रभु चरणों में विनती है हमारी
|$| ॐ श्रीराधेगोविन्दाय नमः |$|
प्रभु-चरणों में विनती है हमारी,
माथा टेकती जहाँ ये दुनियासारी |…प्रभु-चरणों में.......||
हे हृषिकेश ! हे जगतनरेश !
दो आत्मज्ञान करो श्रीगणेश !
अज्ञानी हैं हम सब दुखियारी......प्रभु-चरणों में .......||
हे जगदीश्वर ! हे परमेश्वर !
करो कृपा हों मेरे मृदु-श्वर !
है ये दुनिया बस प्रेम से हारी.......प्रभु-चरणों में.........||
हे परमपिता ! हे कृष्णमुरारी !
है अधीन आपके ये सृष्टिसारी |
प्रभु हर लो अब मेरी भी अंधियारी...प्रभु-चरणों में......||
......................अंगिरा प्रसाद मौर्या ...
>>>>>>>>जय श्री कृष्णा<<<<<<<<<<<<<
वेब संसार में जब पहली बार लिखा गया इस लिंक पर जाएँ- https://m.facebook.com/photo.php?fbid=420126174743150&set=a.419168074838960.98180.419165604839207&type=1&theater&refsrc=http%3A%2F%2Fangiraprasad.blogspot.in%2F2013%2F07%2Fmeri-kritiyan-merelekh-february-23.html&_rdr
सोमवार, 29 जुलाई 2013
रीत जिंदगी की
जिन्दगी की सत और इक अजब रीत है,
कहते हैं लोग की ये प्यार की गीत है,
भले हो ना हो तूँ मीत किसि का पर,
तेरा चरित्र ही तेरा मीत है।
तू बचना नहीं किसी से डरना नहीं,
तेरा नहीं कोई तू किसी का मीत है।
जिंदगी की सत और इक अजब रीत है,
कहते हैं लोग की ये प्यार की गीत है।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
~~~~~~~~~APM
शनिवार, 27 जुलाई 2013
एक गीत उनके आने की ख़ुशी में
अच्छा की तुम पे आ गया,
तुझ को पाया तो जहाँ की
हर ख़ुशी मै पा गया।।
तेरे आने की ख़ुशी क्या
ग़मों की अब काली छटी है
तू जो आई तो मेरी दुनियाँ
संग तेरे कितनी हँसी है।
तुझको पाके मेरे हमदम दोनों जहाँ मै पा गया,
दिल तो है दिल ही तो है, अच्छा की तुम पे आ गया।।
तेरी इन बाहों में लिपटे
हर ख़ुशी हम वार देंगे,
अपने इन आँखों को साजन,
बस तेरा दीदार देंगे।
तेरे कदमों में ए साजन सातों जहाँ मै पा गयी।
दिल तो है दिल ही तो है अच्छा की तुमको भा गयी।
प्यार तो है तू ही तो है सारा जहाँ मैं पा गयी।।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
~~~~~~~~~APM
बुधवार, 24 जुलाई 2013
प्यार क्या है इस बारे में मेरे कुछ शब्द
तत्व वह है जिसे समझा पर पूरा जाना नहीं जा सकता।
निभाया तो जा सकता है पर मिटाया नहीं जा सकता।
गर हो जाए प्यार तो उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।
इसे बढ़ाया तो जा सकता है पर घटाया नहीं जा सकता।
है इसमें चाहत कितनी इसे आजमाया नहीं जा सकता।
झुक सकती है दुनिया पर इसे झुकाया नहीं जा सकता।
इसकी जुदाई में है दर्द कितना ये बताया नहीं जा सकता।
प्यार वह है जिसके बिना ये दुनिया बनाया नहीं जा सकता।
~~~~~~~~~जय श्री कृष्णा~~~~~~~~~ ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
~~~~~~~~~APM
मंगलवार, 23 जुलाई 2013
एक गीत उनकी यादों में
चलते चलते राहों में रुकने की आदत हुई थी,
तेरी ख्वाहिस ही ना थी कि तेरी चाहत हुई थी।।
तेरे लबों पे कलियाँ जो खिलने लगी थी,
मेरी यादों से हरपल तू मिलने लगी थी,
जान के भी नादाँ नज़रे बहकनेे लगी थी,
सोचा बहुत फिर भी खुद से सिकायत हुई थी,
तेरी ख्वाहिस ही ना थी कि तेरी चाहत हुई थी।।
कुसूर किसका ये राम जाने,
हम तो हुए थे नए दीवाने,
तमन्ना थी दिल कब तू जाने,
की हमें तेरे जैसी ही एक रोग भयानक हुई थी,
तेरी ख्वाहिस ही ना थी की तेरी चाहत हुई थी।।
आज फिरता हूँ गलियों में बनके आँवारा,
की तेरा साथ छूटे ये ना था गँवारा,
तेरी उम्मीद में ख्वाब बुनते थे अक्सर,
तेरे बिना मेरे साथ तेरे रहने की आहट हुई थी
तेरी ख्वाहिस ही ना थी की तेरी चाहत हुई थी।।
चलते चलते राहों में रुकने की आदत हुई थी,
तेरी ख्वाहिस ही ना थी की तेरी चाहत हुई थी।।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
~~~~~~~~~APM
रविवार, 21 जुलाई 2013
शुभ-संध्या
फिर देखो आई ये संध्या ,
बाण मोहनी चलाई ये संध्या,
भरी जूनून में अति ये संध्या,
मित्र-बंधु को मेरा शुभ-संध्या।।
हो सर्दी गर्मी या वर्षा का मौसम,
बन्धनों उलझनों में कितने भी हों हम,
हो चंद पलों का या वर्षों का गम,
चंद-दृश्य में हो जाते हैं सब नम।।
फिर...................शुभ-संध्या।
मुझे तो अपना गीत सुनाती,
मानों खुद मन-मीत बताती,
कुछ भी हो प्रतिपल इतराती,
मधुर हवांएं लहराती है संध्या।।
फिर देखो आई ये संध्या,
बाण मोहनी चलाई ये संध्या,
भरी जूनून में अति ये संध्या,
मित्र-बंधु को मेरा शुभ-संध्या।।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
~~~~~~~~~ Angira Prasad Maurya
~~~~~~~~~APM
>>>>>>>जय श्री कृष्णा<<<<<<<
शुभ-संध्या
फिर देखो आई ये संध्या ,
बाण मोहनी चलाई ये संध्या,
भरी जूनून में अति ये संध्या,
मित्र-बंधु को मेरा शुभ-संध्या।।
हो सर्दी गर्मी या वर्षा का मौसम,
बन्धनों उलझनों में कितने भी हों हम,
हो चंद पलों का या वर्षों का गम,
चंद-दृश्य में हो जाते हैं सब नम।।
फिर...................शुभ-संध्या।
मुझे तो अपना गीत सुनाती,
मानों खुद मन-मीत बताती,
कुछ भी हो प्रतिपल इतराती,
मधुर हवांएं लहराती है संध्या।।
फिर देखो आई ये संध्या,
बाण मोहनी चलाई ये संध्या,
भरी जूनून में अति ये संध्या,
मित्र-बंधु को मेरा शुभ-संध्या।।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
~~~~~~~~~ Angira Prasad Maurya
~~~~~~~~~APM
>>>>>>>जय श्री कृष्णा<<<<<<<
दो शब्द उनके लिए भी
ना जानें वो लोग कहाँ जो प्यार करते हैं,
ना जानें वो लोग कहाँ जो इनकार करते हैं,
ना जानें वो भी कहाँ और किस हाल में संगदिल,
जिसे अनजानें में ही हम बेपनाह प्यार करते हैं।।
भगवान करें वो जहाँ भी जिस हाल में हो,
खुशियों एवं शुभ-संदेशों के भरमार में हो,
यही शुभकामना निकलती है ना जाने क्यूँ दिल से,
सोचता हूँ कहीं परीक्षाओं का शैलाब ना हो।।
अभी उम्र में अंजान हैं हम,
इंसान मगर नादान हैं हम,
लाखों दुवाएँ करते हैं फिर भी,
मानों उसपे कुर्बान हैं हम ।।
~~~~~~~~~ Angira Prasad Maurya
~~~~~~~~~ अंगिरा प्रसाद मौर्या
~~~~~~~~~APM
>>>>>>>जय श्री कृष्णा<<<<<<<
कविता - चलो यहीं कहीं पर खो जाएँ हम
शुभ-प्रभात
चिडियाँ चहचहा चुके हैं
कोयल आपको बुला चुके हैं
सूरज-पूरब से निकल पडे हैं
फिजाओं मे नव-स्फूर्ति आ चुके हैं
उठो दोस्तों आज का दिवस है तुम्हारा
हवा भी सिमसिम है और मौसम भी प्यारा
अम्रित का जाम भेज रहा हूँ
फूलों के साथ
नमस्कार और सलाम भेज रहा हूँ
नव-सूरज के साथ
मुबारक हो आपको ये नयी सुबह
पैगाम भेज रहा हूँ
तहे-दिल के साथ
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
~~~~~~~~~APM
शुभ-रात्रि
सोच रहा हूँ एक गुलाब भेज दूँ ,
एक प्यारा अल्फाज़ भेज दूँ |
जा रहा हूँ सोने पर दिल करता है,
आपकी पलकों पर एक प्यारा ख्वाब भेज दूँ |
जय श्री कृष्णा
तहे दिल से सभी मित्रों और बंधुओं को
शुभ-रात्रि
>>>{अंगिर प्रसाद मौर्या }<<
शायरी
यह जिन्दगी का सफ़र तो यूँ ही बरकरार रहता है,
फिर भी आने वाले कल पर हमें ऐतबार रहता है,
जीत लेंगे अबकी हम कर्म-क्षेत्र अपना किसी भी हाल में,
अक्सर सद्गुण वादियों का यही निर्भय विचार रहता है।।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
~~~~~~~~~APM
शायरी
यह जिन्दगी का सफ़र तो यूँ ही बरकरार रहता है,
फिर भी आने वाले कल पर हमें ऐतबार रहता है,
जीत लेंगे अबकी हम कर्म-क्षेत्र अपना किसी भी हाल में,
अक्सर सद्गुण वादियों का यही निर्भय विचार रहता है।।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
~~~~~~~~~APM
शायरी
यह जिन्दगी का सफ़र तो यूँ ही बरकरार रहता है,
फिर भी आने वाले कल पर हमें ऐतबार रहता है,
जीत लेंगे अबकी हम कर्म-क्षेत्र अपना किसी भी हाल में,
अक्सर सद्गुण वादियों का यही निर्भय विचार रहता है।।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
~~~~~~~~~APM
कुछ अपने होते हैं कुछ बेगाने रह जाते हैं, अक्सर हम इस दुनियां से अन्जाने रह जाते हैं, कल बीता फिर भी चंद फ़साने रह रह जाते हैं, कभी हम ही खुद में खुद से बेगाने रह जाते हैं।। ~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या ~~~~~~~~~APM
कुछ अपने होते हैं कुछ बेगाने रह जाते हैं,
अक्सर हम इस दुनियां से अन्जाने रह जाते हैं,
कल बीता फिर भी चंद फ़साने रह रह जाते हैं,
कभी हम ही खुद में खुद से बेगाने रह जाते हैं।।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
~~~~~~~~~APM
दोस्ती के लिए मेरी पंक्तियाँ
यूँ तो ये रूहानी रिश्ता है मंजूर हमें,
चाहे आयें कितनी भी तकलीफें-गमे,
अब तक तो दोस्त ही जानते थे आप,
पर हम तो हैं आपको अब भाई चुनें ।।
~~~~~~~~~APM
वह आने से पहले ही........!
वह आने से पहले ही जाने की सोच लिए,
कभी रूठने से पहले ही मानाने को सोच लिए,
जाने क्या उम्मीद थी उनकी हम-रास्तों से,
जो अपनाने से पहले ही बेगाने को सोच लिए।।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
~~~~~~~~~APM
शनिवार, 20 जुलाई 2013
जय हिन्द
ना जाने किस काम के हैं ये सब किसलिए ये बनी है उनकी क्यारी,
आजाद होते हुए देश शहीद हो रहे सपूत माँ के सरबजीत हुए इसके हितकारी,
हर दरवाजे जीते-जी खटखटाए उसने नहीं सुने ये राजनीतिक व्यापारी,
घर में हुई पतनी विधवा बेगुनाह अनाथ हुईं दो बेटियां बेचारी ,
सांत्वना देते कह रहे हैं इस घटना से हम भी हुए दुखियारी ,
खर्च करते करोडो यहाँ देश-द्रोहियों पर पैसे की कर से बनाते क्यारी,
आखिर कब तक होगी कुनीति और बेवजह व्याभिचारी ,
~~~~~~~~~ अंगिरा प्रसाद मौर्या
>>>>>>>>>जय हिन्द<<<<<<<<<
>>>>>>>वनदे-मातरम<<<<<<<
वो कर रहें प्रहार तुम भी प्रहार दो...
लेना है हर कतरे-लहू का बदला ,
ना की उन्हें अब सम्मान दो....
कब तक शहीद होंगे भगतसिंह..
तुम भी माँ-भारती को सम्मान दो...
..............जय हिन्द....
.......जय भारत ..........
.....वन्दे-मातरम ........
...........अंगिरा प्रसाद मौर्या ........
मनुष्य बेटी को अब गर्भ में ही मृत्यु दे देता..
क्या कुसूर रहता उस अनजान का इस दुनिया से,
है ये समाज उसे जिन्दगी छीन सजा देता .
*****
नहीं मिलेगा सुकून दुनिया में मानवता तोड़कर,
किसी बाप के दिल की दुनिया न लूटो..
हो जाओगे तुरत सुखमय देखो जरा नाता प्रेम से जोड़कर,
पर नाशवान इस दुनिया में पाप मत घूंटो ...
*******
मिटा दो दहेज प्रथा को ये तुमसे है...
पी लो प्रेम का प्याला जो सदा से है...
*******
~~~~~ अंगिरा प्रसाद मौर्या
जय श्री कृष्णा ! जय हिन्द ! वन्दे-मातरम !https://www.facebook.com/photo.php?fbid=338060579630858&set=a.309166969186886.46851.309164945853755&type=1&theater
इस एक स्वप्न से क्या होता है गर कुछ ज्यादा ना हो पाने के लिए,
मित्रों उनसे क्या रूठना जो ना आये हमें कभी मनाने के लिए,
तय किया है कल वहाँ होंगे जहाँ आयें हमें सूरज जगाने के लिए,
रंगीन पल तो बहुत आते हैं स्वप्न देखो खुली आँखों से ऊँचाईओं को पाने के लिए।।
~~~~~~~~~APM
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
***
तारे छा गये हैं आसमाँ में
नींद अब हमें बुला रही है
है यहि दिल के अरमाँ में
लफ्जों मे अब आवाज सी आ रही है
कि हम दोस्त चन्द
समय के लिए बिछड़ रहे है
पर कल फिर हर्सोल्लास के
नव-सूरज का अह्वान कर रहें हैं
सितारों को भेज रहा हूँ
आपको सुलाने के लिए
चाँद भी जा रहे हैं
खिस्से सुनाने के लिए
खो जाओ प्यारे सपनों में
नींद अब हमें बुला रही है
सुबह सूरज से आग्रह किया हूँ
आएंगे आपको जगाने के लिए
>>>शुभ्-रात्रि<<<
***
>>>{जय श्रीकृष्णा}<<<
>>>{अंगिरा प्रसाद मौर्या}<<<
Meri Kritiyan Merelekh
कौन बड़ा है मैं ना जानू क्यूंकि है झूठी मेरी काया।।
यूँ तो पूरा ब्रह्मांड है प्रभु सच्चिदानंद में समाया।
अब हरी जाने या प्रभु जाने हरी व प्रभु की माया।।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
~~~~~~~~~APM
है होली भारत का एक प्रमुख और अनुपम त्यौहार-
प्रतिपल खिलता विभिन्न रंगों से यहाँ बहार -
परम्पराओं की भी सीमा है तुम न करना अत्याचार -
है पर्व ये प्रेम-विखेरन सो बिखेरो पाओ प्रेम अपार-
इस दिन तो मानो रंगों से रंग जाता सारा संसार -
माना जाता होलिका और प्रहलाद को इसका आधार -
बीत रहा ये सत्र और होता नव-सत्र का प्रसार
एवं मनु का जन्मदिवस ये सब भी हैं इसीके आसार -
अब त्यागो कटुताएं मन में लाओ नव-बहार -
होगा जब भाई-चारा तभी है सुखी ये सार संसार -
~~~~~~~~~ अंगिरा प्रसाद मौर्या
जय श्री कृष्णा ! जय हिन्द ! जय माँ भारती
Meri Kritiyan Merelekh
आपकी रात्रि में आज चाँद आ जाये
प्यार भरे लोरियां सुनाते रहें <<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<
आपको नीद गर आ जाये तो सो जाना
मैं चाँद से आग्रह किया हूँ सहलाते रहें <<<<<<<<<<<<<<<<
रात्री शुखद और शुखपूर्ण हो आपकी
नित्य प्यारे-न्यारे सपने सजाते रहें <<<<<<<<<<<<<<<<<<
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
~~~~~~~~~~~जय श्री कृष्णा ~~~~~~~~~~~~~
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
~~~~~~~~मेरी ओर से एक छोटा सा सरस्वती वंदना~~~~~~~
विनती करूँ माँ चरणों में तेरी,
~~~~~~~हे मातु मेरी ! हे मातु मेरी !
अंधियारा है इस ह्रदय में हे माँ, करता है ये तो प्रतिपल बसेरा~~~~~~~
ज्ञानोदय कर कण-कण में हे माँ, हो जागृत मेरे मन में सबेरा ~~~~~~~
स्वरों में आके बस जा तू हे माँ, गाऊँ मैं निशदिन प्रिय-गीत तेरी~~~~~~~
~~~~~~~~~~~~~~~~~~हे मातु मेरी ! हे मातु मेरी !
~~~~~~~जय श्री कृष्णा~~~~~~~
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
सोच रहा हूँ की क्या दोस्तों के नाम भेज दूँ ,
दिल तो कहता है की सुन्दर सा गुलाब भेज दूँ.......
आँखें कहती हैं सुनहरा सा एक ख्वाब भेज दूँ........
फिजायें कहती हैं की मौसमे-सवाब भेज दूँ...........
हवाएं कहती हैं मीठा सा कोई एहसास भेज दूँ.........
घटायें कहती हैं उनमे खुशियों के बरसात भेज दूँ........
दोस्ती कहती है कुछ नहीं बस एक सलाम भेज दूँ.......
मैंने तय किया की प्यार भरा एक जाम भेज दूँ.......
>>>>>>>>>>>><<<<<<<<<<<<<<
प्यार भरा एक जाम भेज रहा हूँ फूलों के साथ
नमस्कार और सलाम भेज रहा हूँ नव-सूरज के साथ
~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या~~~
प्रभु-चरणों में विनती है हमारी,
माथा टेकती जहाँ ये दुनियासारी |…प्रभु-चरणों में.......||
हे हृषिकेश ! हे जगतनरेश !
दो आत्मज्ञान करो श्रीगणेश !
अज्ञानी हैं हम सब दुखियारी......प्रभु-चरणों में .......||
हे जगदीश्वर ! हे परमेश्वर !
करो कृपा हों मेरे मृदु-श्वर !
है ये दुनिया बस प्रेम से हारी.......प्रभु-चरणों में.........||
हे परमपिता ! हे कृष्णमुरारी !
है अधीन आपके ये सृष्टिसारी |
प्रभु हर लो अब मेरी भी अंधियारी...प्रभु-चरणों में......||
......................अंगि
>>>>>>>>जय श्री कृष्णा<<<<<<<<<<<<<https://www.facebook.com/photo.php?fbid=420126174743150&set=a.419168074838960.98180.419165604839207&type=1&theater