मंगलवार, 26 नवंबर 2013

प्रशंसा

जब कोई किसी की बड़ाई करता है तो उसे प्रशंसा कहते हैं। कुछ लोग तो स्वयं ही अपनी बड़ाई कर लेते हैं यह भी एक प्रशंसा है। परन्तु यह आत्मघाती भी है। जब कोई हमारी प्रशंसा करता है तो वह सत्य ही कहता है। किन्तु यदि स्वयं जो अपनी प्रशंसा करता है वह उसमे झूठे अलंकार भी लगाते रहता है। जिससे उसके अंतर में झूठ का प्रसार होने लगता है। और वह लोगों से अपनी बुराईयाँ छुपाकर उसे अच्छाइयों में परिवर्तित करते रहता है। परन्तु उसे इस बात की तनिक भी चिंता नहीं रहती कि वह क्या कर रहा है। उचित या अनुचित!!!!
>>>>>>>~~~~~~~~~<<<<<<<
इसी तरह से एक रईस और उसकी पत्नी थे । उन्हें इस चीज का अहंकार था कि वे बहुत भले लोग हैं। वे कभी दुसरे से दुर्व्योहर या दुराचार नहीं करते। और छोटी-छोटी बातों पर लोगों से सहानुभूति प्रकट करते। पति से ज्यादा पत्नी को अहंकार था। पति तो ज्यादातर अपने उद्द्योग में व्यस्त रहता था। फिर अब घर एवं बाहर के अन्य सभी कार्य पत्नी के ही माध्यम से ही होते थे। और उनकी पत्नी चतुर भी बहुत थी। अपनी प्रशंसा से वह अत्यंत प्रसन्न भी होती थी। एवं भले होने का अहंकार भी था। इन सब के साथ होने के कारण अब वह समझती थी कि जो वह करती है सब सही ही करती है।

कोई नहीं मिलता तो तमाम नौकरों के बीच ही अपनी प्रसंसा कर लेती। परन्तु  े दुसरे की प्रसंसा कोई करे उसे यह सहन नहीं था। हाँ दूसरे से प्रसंसा पाने के लिए वह दूसरों की नगण्य प्रसंसा अवश्य कर दिया करती थी।
पति के सामने अपनी गलती ज्ञात होने पर वह उसे या तो छुपाने का प्रयास करती या तो कोई और बहाने लेकर हठपूर्वक पति को कटुभास कहती। पति समझदार भी था इसलिए वह चुप हो जाया करता था। अब वह इसी तरह जब बच्चे बड़े हो गए तब पति को दफ्तर में भी सहायता करने लगी।
वह यह समझती कि वह अपनेआप में बहुतकुछ है।
 दिनांक:-27/11/2013
~~~~~~~~~Angira Prasad Maurya
प्रसंगतः-

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

कृपया अपनी छवि स्वयं न ख़राब करें /-
अभद्र टिप्पणियों से बचें /-