बुधवार, 22 जनवरी 2014

सुविचार


सादर नमन ! स्वजनों
जय श्री राधेश्याम
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स्वजनों ! अगली पोस्ट पोस्ट द्वारा यह सिद्ध हो चुका है की नित्य योग्य एवं उत्तम फल मीठे ही क्यों होते हैं?

आज का तात्पर्य भी वहीँ से शुरु करते है।

प्रेम से बोलो श्री राधेश्याम की ((((((!)))))))
!!*!! जय!!*!!
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चूँकि संसार की प्रत्येक वस्तुएँ ईश्वर द्वारा प्रदत्त हैं,हम एवं हमारी इन्द्रियाँ भी। ईश्वर के किसी भी वस्तु को अकारण क्षति ना पहुँचे तथा नित्य-योग्य फल देने वाले जीव(पेडों) से किसी को द्वेष ना हो। इसलिए नित्य-योग्य एवं उत्तम फल मीठे होते है।

आशय:- इसी में ईश्वर का एक संदेश भी छुपा या व्याप्त है कि " हमें भी मीठे ही बनना चाहिए"। अर्थात मृदु स्वर वाला, समाज कल्याण पर विचार करने वाला(नित्य-योग्य), परोपकार करना(उत्तम कोटि)।

आप ऐसे भी अनुभव कर सकते हैं या देख सकते हैं कि "जो ईश्वर भक्त होते हैं वे मीठे ही होते हैं"।क्योंकि वो ईश्वर में स्थित होने के कारण ईश्वर का उद्देश्य समझते हैं।

रविवार, 19 जनवरी 2014

अगले पोस्ट के उत्तर का संक्षिप्त तातपर्य

दूसरे शब्दों में:- मिठास दैव/प्रेम प्रतीक है एवं तीखा/कड़वा दानव(राक्षस)/घृणा प्रतीक है।

प्रश्न एवं उत्तर

हमारे अनुसार एक प्रश्न एवं उत्तर :-

प्रश्न:- नित्य-योग्य एवं उत्तम कोटि के फल मीठे ही क्यूँ होते हैं ?

उत्तर:- जिस प्रकार अंधकार का अस्तित्व प्रकाश से है एवं झूठ का अस्तित्व सत्य से है, ठीक उसी प्रकार तीखे का अस्तित्व मीठे से है। परन्तु अभी प्रश्न इस उत्तर को स्पष्ट स्वीकृत नहीं देता ।

मीठा:- वह वस्तु या तत्व जिसे चबाने,खाने या पीने से स्वाद का गुण जिह्वा को प्यारा हो एवं तृप्ति अथवा तृप्ति का आभास हो जाए तथा किसी भी इन्द्रिय को क्षति ना पहुँचे,निःसंदेह वही मीठा है।

तीखा/कड़वा:- वह वस्तु या तत्व जिसे योग्य मात्रा से ज्यादा उपयोग में लाने से प्रत्यक्ष इन्द्रिय क्षति महसूस/आभास हो वही तीखा या कड़वा कहलाता है ।
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चूँकि संसार की प्रत्येक वस्तुएँ ईश्वर द्वारा प्रदत्त हैं,हम एवं हमारी इन्द्रियाँ भी। ईश्वर के किसी भी वस्तु को अकारण क्षति ना पहुँचे तथा नित्य-योग्य फल देने वाले जीव(पेडों) से किसी को द्वेष ना हो। इसलिए नित्य-योग्य एवं उत्तम फल मीठे होते है।
……………जय श्री कृष्णा……………
……………Hare Krishna……………

शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

सदविचार

बहुत से व्यक्तियों को जब इसमें पूर्ण विश्वास हो जाता है कि "मेहनत और प्रयासरत व्यक्ति को दुनिया नमस्कार करती है"। तब तक वे इसके लायक नहीं रह जाते।
17/01/2014

सदविचार

प्रयास/चेष्टा हमें सदैव करना चाहिए, सफलता और असफल होना तो ईश्वर की कृपा है। इससे स्वयं को भूल जाना या चिंताग्रस्त हो जाना अथवा ईश्वर या किस्मत का दोष देना अज्ञानता/नास्तिकता के लक्षण हैं।
17/01/2014