सोमवार, 19 जनवरी 2015

अँधूरा फिर भी रहता है, मैं पूरी बात कहता हूँ ;

अँधूरा फिर भी रहता है,
मैं पूरी बात कहता हूँ।
तेरे ही स्वप्न में जाकर,
मैं पूरी रात रहता हूँ।

तुम मुझसे दूर जाती हो,
ये हरगिज सह नहीं सकता।
मैं तुमसे प्यार करता हूँ,
मैं तुम बिन रह नहीं सकता।

तुम मीलों दूर होती हो,
मैं तुमसे बात करता हूँ।
तेरे ही स्वप्न में जाकर,
मैं पूरी रात करता हूँ।

तुम्हीं संजीवनी मेरी,
तुम्हीं हर साँस मेरी हो।
लिखो ये जीवनी मेरी,
तुम्हीं अब आस मेरी हो।

पहुँचती राह सब तुम तक,
मैं रस्ते रोज चलता हूँ।
तेरे ही स्वप्न में जाकर,
मैं पूरी रात करता हूँ।
        ***
19/01/2015
~~~~~~~~~ अंगिरा प्रसाद मौर्य।

रविवार, 18 जनवरी 2015

बहुत हैं हूर दुनियाँ में, अदा ये तुम में फिर क्यू है

उजाला रोज होता है,
अँधेरा मन में फिर क्यूँ है!
तूँ मुझसे दूर है इतनी,
बसेरा मुझ में फिर क्यूँ है !

हूँ तुम बिन क्यूँ अंधूरा मैं,
तूँ मुझ बिन पूर कैसे है!
तुम्हें बस मैं मिला हूँ तो,
मिलन मजबूर कैसे है !

तूँ मुझसे कब मिली थी ये,
नहीं मैं जानता अब हूँ !
तेरा घर मन में है मेरे,
यही मैं मानता अब हूँ।

बहुत हैं हूर दुनियाँ में,
अदा ये तुममें फिर क्यूँ है!
तूँ मुझसे दूर जब इतनी,
बसेरा मुझ में फिर क्यूँ है !

बताती क्यूँ नहीं कुछ तुम,
तड़फ ये मन में कैसी है।
मना तुम क्यूँ नहीं करती,
झड़प ये मन में कैसी है!

बहुत अन्जान मैं जो हूँ,
तूँ भी नादान फिर क्यूँ है!
तूँ मुझसे दूर क्यूँ इतनी,
बसेरा मुझ में फिर क्यूँ है !
       ~~~~~~~~~ अंगिरा प्रसाद मौर्य।
दिनाँक: 18/01/2015