अब एक नजर प्रतिद्वंदियों के ओर डालते हैं। दो प्रतिद्वंदी यदि आपस में लड़ रहे हों तो उसमे से जो वीर हो जो जीतने लायक हो उसे चाहिए की यदि वह क्षमा दान देकर आपस में समझौता कर लें तो उचित होता है। परन्तु अहंकार वस जो अपने से भी वीर पुरुष को धमका कर क्षमा करने की पुष्टि करता है वह अनुचित है क्योंकि क्षमा वीर को ही सोभा देती है। वीरता सिर्फ बाहुबल से ही नहीं आँकी जा सकती।
वीर का तो सबसे बड़ा लक्षण यह होता है कि वह धीर(धैर्यवान) होता है। इसके साथ साथ वह अपनी जगह पर अटल रहता है। वह अहंकार के वेग में लडखडाता नहीं। उसके चेहरे पर सदैव शान्ति का वास होता है। इसी प्रकार और भी कई लक्षण हैं वीर के।
जो भी हम लिखते हैं सब हमारे अपने विचार होते हैं। यदि किसी को कोई चीज बुरी लगे तो कृपया उस पर न ध्यान देकर अपने पात्र अच्छी चीजें ही ढूंढ़ लें। आपका प्रयास:- यदि आप हमारे लेखों को पढ़कर हमें और कुछ सुझाना चाहते हैं तो, टिप्पणी द्वारा अवश्य सुझाएं ! इस हेतु हम आपके आभारी रहेंगे, अनुरोध एवं चेतावनी:- यदि आप हमारी कृतियों पंक्तियों को कहीं पर भी सम्पादित करना चाहते हैं तो, आपको हमसे अनुमति लेनी होगी , क्योंकि ये सभी पंक्तियाँ रजिस्टर्ड एवं गूगल अथवा किसी भी सर्च इंजन में दृश्यमान हैं
रविवार, 8 दिसंबर 2013
उचित एवं अनुचित
शनिवार, 7 दिसंबर 2013
उचित एवं अनुचित
उचित और अनुचित एक दूसरे के परस्पर उलटे हैं। अर्थात ये एक दूसरे के विलोम शब्द हैं।
उचित:- कोई भी वस्तु या वाणी वहाँ उपयोग करना जहाँ उसका मुल्य हो ।
अनुचित:- कोई भी वस्तु या वाणी कभी भी कहीं भी उपयोग कर देना।
उचित और अनुचित पर प्रायः विद्वान लोग ही ध्यान देते हैं। इनके उचित एवं अनुचित इनके वेद-ग्रंथों द्वारा निर्धारित होते हैं। यहाँ उचित को "सुचारू" एवं अनुचित को "गलती" या "त्रुटी" भी कह सकते हैं। अब आप विद्वान का तात्पर्य तो समझ ही गए होंगे कि जो ज्ञानवान भी होता है। यद्यपि विद्या एवं ज्ञान में भी अंतर है ।
और जो विद्वान नहीं होते तथा बुद्धिमान एवं शक्तिशाली होते हैं, वे अपनी इच्छानुसार उचित और अनुचित का चुनाव कर लेते हैं परन्तु उसपर अटल भी रहते हैं।
इसी तरह जो भ्रमित बुद्धि वाला एवं शक्तिशाली होते हैं। वे अपनी प्रति/इच्छाओं को ही उचित मानते हैं। एवं उनके विरुद्ध जो भी हो सब अनुचित।
अब इसमें भी कई प्रकार हैं! जिनमे से हम कुछ प्रकारों का वर्णन करेंगे।
जैसे व्योहार कुशल व्यक्ति:-
हम जानते हैं की इस संसार में प्रत्येक प्राणी के पास प्रत्येक वस्तुएँ पुर्णतः नहीं होती हैं। कुछ पूर्ण होती हैं तो कुछ आंशिक मात्रा में परन्तु होती सब हैं। इसी तरह आप देखेंगे की किसी किसी व्यक्ति के पास ऐसी हुनर होती है की राह चलते चलते व्योहार स्थापित करते रहता है। इसे व्योहार कुशलता कहते हैं तथा ऐसे व्यक्ति व्योहार कुशल कहे जाते हैं। अब आप इन्हें यदि अपने दृष्टिकोण से देखेंगे तो आपको इनके अन्दर बहुत सारे अनुचितता मिलेगी। परन्तु वही उनके लिए उचित होता है। प्रायः इस संसार में उचित और अनुचित में ऐसा भी ज्यादातर भेद रहा है और रहेगा भी।
और जो व्योहार कुशल व्यक्ति होते हैं वे कोई बहुत ज्यादा ज्ञानी या बुद्धिमान भी नहीं होते। उनके अन्दर अकेलेपन की हमेशा एक प्रकार से डर छुपी रहती है। उनका मन हमेशा किसी न किसी का समर्थन चाहता है। इसी समर्थन और अकेलेपन को दूर करने की आस में अक्सर वे दूसरे का समर्थन करने को तत्पर रहते हैं। अब वह समर्थन वह किसे और क्यों दे रहे हैं इसका उन्हें जरा भी ज्ञान नहीं रहता जब वह अपने आप को अकेला महसूस करने लगते हैं। अर्थात ये तो शायद ही उचित और अनुचित का ध्यान देते हैं।
प्रशंगत: ------
बुधवार, 4 दिसंबर 2013
हर लो प्रभु मेरी अधियारी
हर लो प्रभु मेरी अंधियारी।।
हो तुम्हीं ज्ञान, विज्ञान तुम्हीं हो,
जग में बस सज्ञान तुम्हीं हो,
तुम्ही भक्त, भगवान तुम्हीं हो,
है लीला तुम्हरी जगत में न्यारी।।नित करते......अंधियारी।।
नहीं ध्यान है क्या अब ध्यावैं,
सारी विपदा किसे सुनावैं,
दृष्टि पड़े अब शरणागत पर,
जग के हो प्रभु तुम हितकारी।। नित करते.....अंधियारी।।
अपराध हुए जो अंधकार में,
हुईं जो त्रुटियाँ व्योहार में,
क्षमा करो प्रभु यह विनती है,
अब हर लो प्रभु मेरी अंधियारी।।नित करते.....अंधियारी।।
~~~~~~~~~जय श्री कृष्ण
दिनांक:- २८/११/२०१३
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
हर लो प्रभु मेरी अधियारी
हर लो प्रभु मेरी अंधियारी।।
हम क्या थे ये नहीं जानते,
आज भी कुछ हैं नहीं मानते,
सद्मार्ग प्रसस्त हो शरणागत का,
आज्ञा तुम्हारी सभी है प्यारी।।
दिव्यज्ञान से परिपूर्ण करो अब,
कलुष-भेद सब कूट करो अब,
तुम्ही विधा हो तुम्ही विधाता,
है महिमा तुम्हारी जगत में न्यारी।।
हो वही कर्म जो तुमको भावे,
जग में हम भी श्रेष्ठ कहावें,
उपकार तुम्हारा हम नित गावें,
तुम सुन लो प्रभु विलख हमारी।।
नित करते वंदन श्याम तुम्हारी,
हर लो प्रभु मेरी अधियारी।।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
दिनांक:- ०३/१०/२०१३
~~~~~~~~~APM
>>>>>>>>>जय श्री कृष्णा<<<<<<<<<
भगवान आनंदकंद प्रभु श्री कृष्ण जी के जन्मअष्टमी पर
भाग्योदय हुआ पृथ्वी का
की प्रभु मेरो आयो रे,
दसों दिशाएँ झूम उठी हैं
सारे जग में धूम मचायो रे।।
कंस का पलड़ा हुआ है भारी
दुखियारी बाकी नर-नारी
अलौकिक दीप जलायो रे,
दसों दिशाएँ झूम उठी हैं
सारे जग में धूम मचायो रे।।
कृष्ण ही कारण कृष्ण ही कर्ता
माध्यम और सर्व जग-भर्ता
पालनकर्ता मनु-वेस बनायो रे,
दसों दिशाएँ झूम उठी हैं,
सारे जग में धूम मचायो रे।।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
~~~~~~~~~APM
~~~~~~~~~Angira Prasad Maurya
~~~~~~~जय श्री कृष्णा~~~~~~~
~~~~~~~~~HARE KRISHNA~~~~~~~~~
जय हिन्द
जम के करते हैं प्रभुताई,
वोट दीजै प्रभु शरणागत को,
चरण पकड़ के करत दुहाई।।
सज्जन को तो राम राम की,
दुर्जन को व्हिस्की बड़े काम की,
लगता दुनियाँ के पालक हैं,
मदद वाहनों से धूमधाम की।।
वर पायो जब पंचवर्ष का,
नित देखो करते ठगड़ाई
हमहीं प्रभु हैं,हमहीं हैं दाता,
हस कर लेते हैं अंगड़ाई।।
मुझे तो लगता ये नहीं हैं मानव,
लक्षण से दिखते हैं दानव,
हिन्द सभ्यता टूट चुकी अब,
है परिवर्तित दानव में मानव।।
है दूषित इनकी काया देखो,
नित गर्भित भव-माया देखो,
कदम-कदम पर रिश्वत-खोरी,
था जाल यही बस साया देखो।।
"मौर्य" कहत प्रतिकार करो अब,
कल्कि रूप अवतार करो अब,
त्राहि-त्राहि है चाहँुदिश छायो,
हिन्द को तारमतार करो अब,
दिनांक~~~~~~~~~२७/११/२०१३
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
~~~~~~~~~APM
[साया - अल्प प्रभाव (पूर्ण प्रभाव सरेआम{प्रत्यक्ष} लूट-पाट या डकैती तो कर नहीं पाएंगे। अतः इनकी आज्ञा के शिकार जो कार्यकर्ता कार्य करते हैं उनपर एवं उनके कार्य पर इन दुर्जनों की ही साया रहती है।
भ्रष्टों तुम्हारी कुटिलता बहुत हुई अब
हिन्द में रहते हो तो जय हिन्द मुस्कुराके कहो।।
लुट रहा है अमन-चमन की भूल नहीं पाओगे,
रो रहा व्योसायी तो तुम ठहर नहीं पाओगे,
शंखनाद हुआ है की आज पश्चिम से,
पूरब से उदय होगा तो वहीँ पे जल जाओगे।।
तुमने बढ़ाये अत्याचार छुप के खेला खूब पिकोल,
टूटी तुम्हारी नहीं जुटेगी दमदार लगा लो फेविकोल,
सपूत हिन्द का समझ गया है पहन सको ना कोई चोल,
"मौर्य"अडिग है सत्य के पथ पर भले ही बदलो अपनी गोल।।
हिन्द विश्व का श्रेष्ठ संस्कृती इसे धूमिल ना होने देंगे,
मातृभूमि के रखवाले हम कभी इसे ना रोने देंगे,
"हिन्द सपूत" हैं लिए प्रतिज्ञा,हर शाम का बदला सबसे लेंगे,
कल लायेंगे नई सुबह फिर,पर रात्रि तुम्हें ना सोने देंगे।।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
०२/१०/२०१३
~~~~~~~~~APM
।।जय हिन्द।। वन्दे-मातरम।।
परम वीर भगत सिंह को कोटि-कोटि नमन।
ना पनपने देंगे विष व क्रूरता-अधम,
आओ आजादी को अपने बनाएँ सनम,
भगत सिंह तेरी बुलंदी को सत-सत नमन।।
घाव हैं हिन्द के तो तुम हो मरहम,
पाँव हैं हिन्द के तो तुम अगला कदम,
दुश्मन हैं निर्मम, बनो तुम भी जघन,
मिटा दो भ्रष्टता अब लाओ चमन।।
युवाओं तुम---------क्रूरता-अधम।।
घोष करो जय हिन्द का कि गूँजे गगन,
संतोष किये तो सूखे ये शांति-अमन,
सांप्रदायिक विवादों का कर दो दफ़न,
कि दुनियाँ का मिट जाए तुरत ही वहम।।
युवाओं तुम---------क्रूरता-अधम।।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
~~~~~~~~~APM
दिनांक:- २८/०९/२०१३
हिन्द के दामन में कुछ शब्द भर रहा हूँ
अपने भारत को सादर नमन कर रहा हूँ,
बंदूक तोप नहीं है हाथ में किंचिद मेरे,
पर शब्दों में वतन की झलक लिख रहा हूँ।।
यही वो भारत है धर्मियों का हिंदुस्तान,
आज की दुर्दशा जानता है सारा जहान,
आज बहुत हैं बने अधर्मियों के कारवां,
स्थिति पे मैं ऐसी रुदन कर रहा हूँ।।
हिन्द के....................लिख रहा हूँ।।
लिखा जाता है मोटे अक्षरों में भारत महान,
नित्य निकलती जा रही है अब इसकी जान,
जाने अब कब होगा भ्रष्टाचार से निदान,
ईश्वर की महिमा का किरण गिन रहा हूँ।।
हिन्द के....................... लिख रहा हूँ।।
~~~~~~~~~वन्दे-मातरम।।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
~~~~~~~~~APM
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अपने भारत को सादर नमन कर रहा हूँ,
बंदूक तोप नहीं है हाथ में किंचिद मेरे,
पर शब्दों में वतन की झलक लिख रहा हूँ।।
यही वो भारत है धर्मियों का हिंदुस्तान,
आज की दुर्दशा जानता है सारा जहान,
आज बहुत हैं बने अधर्मियों के कारवां,
स्थिति पे मैं ऐसी रुदन कर रहा हूँ।।
हिन्द के....................लिख रहा हूँ।।
लिखा जाता है मोटे अक्षरों में भारत महान,
नित्य निकलती जा रही है अब इसकी जान,
जाने अब कब होगा भ्रष्टाचार से निदान,
ईश्वर की महिमा का किरण गिन रहा हूँ।।
हिन्द के....................... लिख रहा हूँ।।
~~~~~~~~~वन्दे-मातरम।।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
~~~~~~~~~APM