शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

जहाँ सत्य है वहीं धर्म है और जहाँ सत्य एवं धर्म दोनों हैं वहीं महालक्ष्मी पुर्णतः सुख का अनुभव करती हैं। अन्यथा उनके पुत्र तो सभी हैं।


झूठ सदा है वही बोलता, जिसको सत्य पता होता है,
झूठ की काया नहीं बनी है, ये तो सत्य-खता होता है।

झूठ सत्य का उल्टा होता, सत्य में इसका भार कहीं है,
"मौर्य" सत्य की गणना क्या है?, ये कोई व्यापार नहीं है।

वास धर्म का वहीं पे होता, सत्य जहाँ पूजा जाता है,
नहीं लक्षमी का वास वहाँ पे, कर्त्य जहाँ झूठा होता  है।

कथा सुनाते एक पुरानी, कुरू वंश का ताज वहीँ था,
सत्य-धर्म की हानि हुई थी, लोभी "धृत" का राज वहीं था।

पांडु-पुत्र थे सौतेले जहँ, किंचिद जिनमे पाप नहीं था,
ज्येष्ठ धर्म के अधिकारी थे, झूठ में उनका वास नहीं था।

कूटनीति तब प्रबल नहीं थी, राजनीति था गुरु धरोहर,
जयेष्ट-पुत्र युवराज थे होते, यही सत्य-सम्मान सरोवर।

सकुनी मामा बड़ा चतुर था, भांजे को विश्वास दिलाता,
तुम्ही राज्य के अधिकारी हो, मोह में उससे घात कराता,

धृत को मोह ने ऐसा बाँधा, निर्णय में सम राशि  नहीं था,
दुर्योधन ने किया निरादर, पांडु पुत्र को आस नहीं था।

पांडु विचार किये तबहीं सब, बाप का अपने हिस्सा लेंगे,
भीम प्रतिज्ञा बद्ध हुए थे, बदला हम उपहास का लेंगे।

विदुर धर्म के ही नायक थे, नगर में जिनका वास वहीं था,
छोड़ चले जब वो नगरी को, नगर लक्ष्मी को रास नहीं था।

कूटनीति में पाप प्रबल था, देना कौड़ी रास नहीं था।
धर्म अधर्म पे भारी होता, मामा को विश्वास नहीं था।

युद्ध छिड़ा फिर एक भयानक, जहाँ धर्म का राज कभी था,
एक तरफ पथ सत्य का देखो,  झूठ का दूजा साज वहीं था।

"मौर्य" सत्य तो अजर-अमर है, जिनको ये विश्वास नहीं था।
जान भी उनकी गई फिर, भीष्म-द्रोण का साथ वहीं था।

सत्य सहारे चलते थे वो, कौड़ी इक जिनके पास नहीं था,
बने अखण्ड-सम्राज्य के मालिक, धर्म-पतन विश्वास नहीं था।
……………जय श्री कृष्ण……………
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
दिनाँक:- २८/०२/२०१४
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गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

प्रेम


भाँति-भाँति मर्यादा जिसमे, जग में जिसका सार नहीं है,
प्रेम डगरिया बड़ी कठिन है, जग में इसका पार नहीं है ।

प्रेम हृदय में ही खिलता है, इसका इक आकार नहीं है,
भाँति- भाँति के रूप हैं इसके, इसका कोई पार नहीं है।

प्रेम पुत्र से ऐसा होता, स्नेह कभी फटकार कहीं है,
स्नेह है ममता का आभूषण, पितु की मर्यादा हार वहीँ है।

प्रेम है जिद में नहीं पनपता, क्रोध ही  जिसका तार कहीं है,
आशा की इक नई किरण ये, जहाँ भक्त भगवान वहीँ है।

प्रेम रंग कुछ ऐसा होता, स्वेच्छा है बलिदान कहीं है,
प्रेम उदित ममता से होता, पीड़ा का जहँ पार नहीं है।

"मौर्य" वस्तु में नहीं प्रेम है, बुद्धि में इसका वास नहीं है,
प्रेम ह्रदय का आभूषण है, ईश में जिसका तार कहीं है।
………जय माँ शारदे………
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
~~~~~~~~~APM
दिनाँक:- २७/०२/२०१४
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कुछ शाब्दिक अर्थ:-

हार= गौरव रूपी माला, मर्यादा के बाहर जाने पर जिसके चलते डांट, फटकार भी पड़ती है।

ममता= मुहब्बत, मुहब्बत इश्क नहीं है इश्क में तो जिद है, जो कि मुहब्बत में नहीं होती हमारे मुताबिक।

तार= तार का अर्थ संयोग(connection) रूपी माध्यम से है।
यहाँ पर "ईश में जिसका तार कहीं है" वाक्य अत्यंत महत्वपूर्ण है। जिसका आशय है, "हृदय आत्मा से जुड़ा है और आत्मा परमात्मा(ईश,ईश्वर) से।

बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

ममता


धरा पे ममता जहाँ नहीं हैं, खुशियों का आसार नहीं है,
करती ममता वास जहाँ पर, प्रेम वही है प्यार वहीं है।

वहाँ पे निशदिन शोक मनाते, घृणा-द्वेष भी जहाँ कहीं है,
मातु-पिता जहँ पूजे जाते, खुशियों का भंडार वहीँ है।

निति नहीं है जिस दुनियाँ में, बाधाओं का तार वहीं हैं,
अहम भाव है जहाँ पनपता, अपमान वहीँ उपहास वहीँ है।

गुरु है माता पिता गुरु है, किंचिद यहाँ विकार नहीं है,
मातु-पिता जहँ पूजे जाते, खुशियों का वहँ सार नहीं है।

"मौर्य" कहत श्रृंगार जिसे वह, मन में बैठा शाप नहीं है,
जन-जन में हो भाईचारा, अलंकार वही श्रृंगार वहीँ है।

समय के चलते सब झुक जाते, किसी को कुछ की प्यास नहीं है,
झुक जाये ममता अगर अचानक, तो दुनियाँ भी कम्पास नहीं ह।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
~~~~~~~~~ Angira Prasad Maurya
दिनांक:- २६/०२/२०१४
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यहाँ पर शाप का आशय श्राप(दूसरे पर उपकार ना करके तिरस्कृत करना अथवा उसको हानि पहुचाने की योजना बनाना) से है
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कम्पास:- कम्पास का आशय उस डिवाइडर से है जिसमे ममता का पेन्सिल बाँध कर यह दुनियाँ अपनी गति पर गतिमान है।
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जय श्री कृष्णा
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मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

जय माँ शारदे


कथा सुनी थी एक भयंकर, सबको मंजिल गुहराते हैं,
आज प्रेम की बात पुरानी, लोग यहाँ पर दुहराते हैं।

डाँकू था वह एक से बढ़कर, नगर बस्तियाँ थर्राते थे,
वाल्मीकि अब नाम है उनका, सुर-नर-मुनि सब गुन गाते हैं।

अज्ञान से भरा हुआ था, गड़बड़ से सब घबराते थे,
कालिदास अब नाम है उनका, काव्य-शिरोमणि कहलाते हैं।

जीत नहीं अब हार में होती, लोग यहाँ पर गुर्राते हैं,
आज प्रेम की बात पुरानी, लोग यहाँ पर दुहराते हैं।

"मौर्य" विनय है सुन लो माता, लोग यहाँ पर दुख पाते हैं,
वीणा की झंकार करो फिर, प्रेम हृदय में खिल जाते हैं।

तुम्ही विधा हो तुम जग-माता, मुरली-कान्हा तुम से पाते हैं,
है अज्ञान माँ भक्त तुम्हारा, ना लय ना ही स्वर आते हैं,
नव गति नव लय ताल-छंद नव, सब के सब तुमसे पाते हैं,
जगह हमें भी दो आँचल में, जिसमे शिसु बस मुस्काते हैं।।
……………जय माँ शारदे……………
दिनांक:- २५/०२/२०१४
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

परिचय अथवा पहचान

जो पूर्ण है वही अपना निश्चित परिचय दे सकता है। वह मनुष्य अपूर्ण से ज्यादा और क्या हो सकता है, "जो न जाने कब कहाँ बहक जाए/भटक जाए। >>>मैं एक मनुष्य हूँ। इससे ज्यादा मेरा और कोई परिचय नहीं है। इसी में पूर्णता है। और यही मेरी पूरी पहचान है।<<<>>>जय श्री कृष्ण<<<