मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

जय माँ शारदे


कथा सुनी थी एक भयंकर, सबको मंजिल गुहराते हैं,
आज प्रेम की बात पुरानी, लोग यहाँ पर दुहराते हैं।

डाँकू था वह एक से बढ़कर, नगर बस्तियाँ थर्राते थे,
वाल्मीकि अब नाम है उनका, सुर-नर-मुनि सब गुन गाते हैं।

अज्ञान से भरा हुआ था, गड़बड़ से सब घबराते थे,
कालिदास अब नाम है उनका, काव्य-शिरोमणि कहलाते हैं।

जीत नहीं अब हार में होती, लोग यहाँ पर गुर्राते हैं,
आज प्रेम की बात पुरानी, लोग यहाँ पर दुहराते हैं।

"मौर्य" विनय है सुन लो माता, लोग यहाँ पर दुख पाते हैं,
वीणा की झंकार करो फिर, प्रेम हृदय में खिल जाते हैं।

तुम्ही विधा हो तुम जग-माता, मुरली-कान्हा तुम से पाते हैं,
है अज्ञान माँ भक्त तुम्हारा, ना लय ना ही स्वर आते हैं,
नव गति नव लय ताल-छंद नव, सब के सब तुमसे पाते हैं,
जगह हमें भी दो आँचल में, जिसमे शिसु बस मुस्काते हैं।।
……………जय माँ शारदे……………
दिनांक:- २५/०२/२०१४
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या

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