सोमवार, 13 अप्रैल 2015

मैं अनपढ़ हूँ प्रेम जगत में तुम ही मेरी भाषा हो

मैं अनपढ़ हूँ प्रेमजगत में, तुम ही मेरी भाषा हो !
तुम मेरी अभिलाषा हो ! तुम मेरी जिज्ञासा हो !

आस तुम्हारे जीवन चलता, पास तुम्हारे है उज्ज्वलता।
बिना तुम्हारे नहीं सफलता, तुमसे ही सामर्थ्य निकलता।

तुम हो प्यारी मूरत जैसी, बोल तुम्हारे हैं अतिकोमल।
निशा के जैसी शीतल छाया, किरण तुम्हारे सबसे निर्मल।

तुम वसुधा की बेटी हो, तुम अम्बर की आशा हो।
तुम मेरी अभिलाषा हो, तुम मेरी जिज्ञासा हो ।

कांति तुम्हारी सबसे न्यारी, तुम सुन्दरता की बलिहारी।
तुम सदगुण उपजाती जैसे, है तुमसे ही निर्मित नारी।

तुम मेरे स्वपनों में आती, आँगन में भी आ जाओ अब।
वर्षों से ये पुष्प है मुरझा, आके इसे खिला जाओ अब।

अधिक नहीं अब शब्द हैं मेरे, तुम इस हिय की भाषा हो।
तुम मेरी अभिलाषा हो ! तुम मेरी जिज्ञासा हो।
             ।। 14/03/2015 ।।
~~~~~~~~~ अंगिरा प्रसाद मौर्य।

रविवार, 12 अप्रैल 2015

अंधूरापन और मन की कुछ अनकही अनसुनी बातें

अँधूरापन अंधूरापन,
नहीं है ये कोई जीवन।
मेरे तुम साथ में आओ,
बनालो तुम मुझे दर्पण।

तुम्हारी हर चहक को मैं,
महकने को बदल दूँगा।
तुम्हारे मन्नतें जो हैं,
उन्हें अपनी मैं कर लूँगा।

सुनो एक बात मेरी तो,
ये सूना है मेरा आँगन।
मेरे तुम साथ में आओ,
बनालो तुम मुझे दर्पण।

बहुत तुम खूबसूरत हो,
अदा हर एक प्यारी है।
इन आँखों में समंदर है,
लहर सबसे ही न्यारी है।

तूफानों को न उकसाओ,
यौवन ये आयु छोटी है।
तुम्हारा मन जो प्यासा है,
ये दुनियाँ भी तो खोटी है।

तुम्हें विश्वास जो मेरा,
तो कर दो आज ही अर्पण।
मेरे तुम साथ में आओ,
बनालो तुम मुझे दर्पण।
              ।। 07/01/2015 ।।
~~~~~~~~~ अंगिरा प्रसाद मौर्य।