गुरुवार, 28 नवंबर 2013

अहंकार

अहंकार वह वास्तु या तत्व है जो अन्य सभी तत्वों को झूठा कर देता है। हम साधारण प्राणियों के लिए यह अकाट्य है। परन्तु ईश्वर की कृपा व उनकी चिकित्सा द्वारा इस पर विजय पाया जा सकता है। यह हर व्यक्ति के अन्दर वास करती है। इसे पूरा का पूरा जान पाना भी संभव नहीं है। जैसे- किसी को अपने विद्वता पर अहंकार होता है परन्तु वह इसे तत्वतः जान नहीं पाता क्योंकि लोग उसे विद्वान का श्रेय देते ही रहते हैं। श्रेय देने से उतना अहंकार नहीं उत्पन्न होता जितना की अपने से बड़े ज्ञानी का खुद में ही सत्यापन करके। वह औरों को पता हो ना हो परन्तु उसे अवश्य ही ज्ञात हो जाता है कि हम किसी से कम भी हैं ! जिसे श्रेय दिया जाता है। अब इस समय ऐसे व्यक्ति अनुशरण करने की आवश्यकता होती है, परन्तु अहंकार इतना प्रबल है कि उससे अनुकरण करवाने लगता है। जैसे ज्ञानी से भी बड़ा ज्ञानी बनने की विद्वता का प्रदर्शन।

यद्यपि अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। मेरे समझ से इसका पूरक अभिमान को भी कहा जा सकता है। जैसे ऋषियों मुनियों को भी अपने शक्ति एवं सिद्धियों पर बहुत अभिमान रहता था जबकि वो परम ज्ञानी रहते थे। उदहारण के लिए आप दुर्वाषा ऋषि को ही मान सकते हैं।
यहाँ तक की भगवान के बड़े-बड़े भक्तों में भी किंचिद अहंकार छुपा होता है। जैसे- अपने आप को ईश्वर का सबसे करीबी भक्त समझना। या अन्य लोगों को देख उनसे अपनी तुलना करना आदि।
यद्यपि हम इसके लक्षणों की विवेचना करें तो हमें बहुत सारे लक्षण प्राप्त होंगे। परन्तु इन लक्षणों को हम अपने अन्दर झाँक के नहीं देख पाते। जैसे- मै यह लेख लिख रहा हूँ और शेयर कर रहा हूँ। हमें ऐसा प्रतीत हो रहा है कि यह सबको ज्ञात नहीं है। हम बताएँगे तो लोग जानेंगे। इसी तरह अहंकार जो हमारा शत्रु है उसे हम स्वयं देख और उसका प्रतिकार नहीं कर पाते।
मै समझता हूँ कि यह केवल ईश्वर की ही चिकित्सा द्वारा संभव है की हम इससे पार पा सकें। जैसे किसी के सामने हमें सर झुकाने पर मजबूर कर देना। या किसी विशेष परिस्थिति में शक्तियों का आभाव कर देना आदि।
अब लेख बहुत बड़ा हो रहा है अतः इसे यहीं विराम देते हैं।
>>>>>>>जय श्री कृष्ण<<<<<<<
~~~~~~~~~APM

मंगलवार, 26 नवंबर 2013

प्रशंसा

जब कोई किसी की बड़ाई करता है तो उसे प्रशंसा कहते हैं। कुछ लोग तो स्वयं ही अपनी बड़ाई कर लेते हैं यह भी एक प्रशंसा है। परन्तु यह आत्मघाती भी है। जब कोई हमारी प्रशंसा करता है तो वह सत्य ही कहता है। किन्तु यदि स्वयं जो अपनी प्रशंसा करता है वह उसमे झूठे अलंकार भी लगाते रहता है। जिससे उसके अंतर में झूठ का प्रसार होने लगता है। और वह लोगों से अपनी बुराईयाँ छुपाकर उसे अच्छाइयों में परिवर्तित करते रहता है। परन्तु उसे इस बात की तनिक भी चिंता नहीं रहती कि वह क्या कर रहा है। उचित या अनुचित!!!!
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इसी तरह से एक रईस और उसकी पत्नी थे । उन्हें इस चीज का अहंकार था कि वे बहुत भले लोग हैं। वे कभी दुसरे से दुर्व्योहर या दुराचार नहीं करते। और छोटी-छोटी बातों पर लोगों से सहानुभूति प्रकट करते। पति से ज्यादा पत्नी को अहंकार था। पति तो ज्यादातर अपने उद्द्योग में व्यस्त रहता था। फिर अब घर एवं बाहर के अन्य सभी कार्य पत्नी के ही माध्यम से ही होते थे। और उनकी पत्नी चतुर भी बहुत थी। अपनी प्रशंसा से वह अत्यंत प्रसन्न भी होती थी। एवं भले होने का अहंकार भी था। इन सब के साथ होने के कारण अब वह समझती थी कि जो वह करती है सब सही ही करती है।

कोई नहीं मिलता तो तमाम नौकरों के बीच ही अपनी प्रसंसा कर लेती। परन्तु  े दुसरे की प्रसंसा कोई करे उसे यह सहन नहीं था। हाँ दूसरे से प्रसंसा पाने के लिए वह दूसरों की नगण्य प्रसंसा अवश्य कर दिया करती थी।
पति के सामने अपनी गलती ज्ञात होने पर वह उसे या तो छुपाने का प्रयास करती या तो कोई और बहाने लेकर हठपूर्वक पति को कटुभास कहती। पति समझदार भी था इसलिए वह चुप हो जाया करता था। अब वह इसी तरह जब बच्चे बड़े हो गए तब पति को दफ्तर में भी सहायता करने लगी।
वह यह समझती कि वह अपनेआप में बहुतकुछ है।
 दिनांक:-27/11/2013
~~~~~~~~~Angira Prasad Maurya
प्रसंगतः-

शनिवार, 2 नवंबर 2013

शुभ-दीपावली

ॐ श्री राधेगोविन्दाय नमः
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परम्पराएँ तो बहुत हैं हिन्द में,
इसे प्रेम-प्रकाश पर्व मानों तुम।
मिलेंगी गाथाएँ भी बहुत हिन्द में,
इसे उनका उदय ही जानों तुम।
मिटती सारी कटुताएं इस दिन,
इसे हिन्द की विजय जानों तुम।
छोड़ दो छल की मिलावट,
अन्तः प्रकाश को भी जानों तुम।
अस्तित्व यहीं से है जगत का,
प्रतिज्ञा है हिन्द की ये मानों तुम।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
~~~~~~~~~APM
दिनाँक:- ०३/११/२०१३