अहंकार वह वास्तु या तत्व है जो अन्य सभी तत्वों को झूठा कर देता है। हम साधारण प्राणियों के लिए यह अकाट्य है। परन्तु ईश्वर की कृपा व उनकी चिकित्सा द्वारा इस पर विजय पाया जा सकता है। यह हर व्यक्ति के अन्दर वास करती है। इसे पूरा का पूरा जान पाना भी संभव नहीं है। जैसे- किसी को अपने विद्वता पर अहंकार होता है परन्तु वह इसे तत्वतः जान नहीं पाता क्योंकि लोग उसे विद्वान का श्रेय देते ही रहते हैं। श्रेय देने से उतना अहंकार नहीं उत्पन्न होता जितना की अपने से बड़े ज्ञानी का खुद में ही सत्यापन करके। वह औरों को पता हो ना हो परन्तु उसे अवश्य ही ज्ञात हो जाता है कि हम किसी से कम भी हैं ! जिसे श्रेय दिया जाता है। अब इस समय ऐसे व्यक्ति अनुशरण करने की आवश्यकता होती है, परन्तु अहंकार इतना प्रबल है कि उससे अनुकरण करवाने लगता है। जैसे ज्ञानी से भी बड़ा ज्ञानी बनने की विद्वता का प्रदर्शन।
यद्यपि अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। मेरे समझ से इसका पूरक अभिमान को भी कहा जा सकता है। जैसे ऋषियों मुनियों को भी अपने शक्ति एवं सिद्धियों पर बहुत अभिमान रहता था जबकि वो परम ज्ञानी रहते थे। उदहारण के लिए आप दुर्वाषा ऋषि को ही मान सकते हैं।
यहाँ तक की भगवान के बड़े-बड़े भक्तों में भी किंचिद अहंकार छुपा होता है। जैसे- अपने आप को ईश्वर का सबसे करीबी भक्त समझना। या अन्य लोगों को देख उनसे अपनी तुलना करना आदि।
यद्यपि हम इसके लक्षणों की विवेचना करें तो हमें बहुत सारे लक्षण प्राप्त होंगे। परन्तु इन लक्षणों को हम अपने अन्दर झाँक के नहीं देख पाते। जैसे- मै यह लेख लिख रहा हूँ और शेयर कर रहा हूँ। हमें ऐसा प्रतीत हो रहा है कि यह सबको ज्ञात नहीं है। हम बताएँगे तो लोग जानेंगे। इसी तरह अहंकार जो हमारा शत्रु है उसे हम स्वयं देख और उसका प्रतिकार नहीं कर पाते।
मै समझता हूँ कि यह केवल ईश्वर की ही चिकित्सा द्वारा संभव है की हम इससे पार पा सकें। जैसे किसी के सामने हमें सर झुकाने पर मजबूर कर देना। या किसी विशेष परिस्थिति में शक्तियों का आभाव कर देना आदि।
अब लेख बहुत बड़ा हो रहा है अतः इसे यहीं विराम देते हैं।
>>>>>>>जय श्री कृष्ण<<<<<<<
~~~~~~~~~APM