मंगलवार, 23 सितंबर 2014

चरित्र / लिपि

जग से जिनका नाता है, चरित्र उन्हीं को पाता है,
घृणित धर्म यदि ना होता तो, सब कोई ही भ्राता है।

कठिन डगर क्यूँ ईश बनाया, चप्पे-चप्पे में चुनवाया,
क्यों सोना क्यों काँसा है, समझ तनिक ना आता है।

व्याख्या में क्या लिखूँ यहाँ पर, आँख्यां ढूंढें किसे कहाँ पर,
निशदिन नियम भुलाता है, तनिक समझ ना आता है।

मूक वही है इस दुनियाँ में, समय ने जिसको डांटा है,
जिनको थोड़ी छूट मिली है, गीत कोई भी गाता है।

स्नेह है गर्भित अब तुलना से, नेह की विकृति भी तुलना से,
रह जाऊँ या छोड़ चलूँ जग, तनिक समझ ना आता है।

हमने कैसा मार्ग चुना है, कच्चा ना कुछ सभी भुना है,
"मौर्य" कलुष ना धारण करना, लिपि में नहीं समाता है।
२३/०९/२०१४
______________ अंगिरा प्रसाद मौर्या।

प्रेम जगत 3

-: ये भूल थी मेरी कुछ या भूल ही किया है :-

हमदर्द मेरा होके, तूँ दर्द क्यूँ दिया है,
ये भूल थी मेरी कुछ, या भूल ही किया है।

साथ हम जिएंगे, अब साथ ही मरेंगे,
ये आरजू तेरी थी, या थी कोई बनावट,
कलाइयों में मेहँदी, वो नाम की लिखावट,
ये प्रेम की कला है, या झूट की सजावट,
दिया था हमने कंगन, क्यूँ हाथ में लिया है।
ये भूल थी मेरी कुछ, या भूल ही किया है।

है नाम तेरा दिल में, बदनाम क्यूँ महफ़िल में,
ये कैसे मैं दिखाऊँ, हूँ मैं ही तेरे दिल में,
सुबूत मैं क्या लाऊँ, एक था मेरा तूँ अपना,
अब ठहरी जिन्दगी है, टूटा हुआ है सपना,
ऐ संग मरने वाले, एक खून क्यूँ किया है।
ये भूल थी मेरी कुछ, या भूल ही किया है।

थी हमने की मुहब्बत, ली हमने अब सजा है,
प्यार की ये फितरत, तेरी तो हमनवा है,
एक पल को ही सही पर, तू दर्द की दवा है,
क्या खूब वो खुदा है, जो तेरा ही गवाह है,
दर्द का ये मंजर, थाम हमने अब लिया है।
ये भूल थी मेरी कुछ, या भूल ही किया है।
        (सर्वाधिकार सुरक्षित)
~~~~~~~~~ अंगिरा प्रसाद मौर्या।