जग से जिनका नाता है, चरित्र उन्हीं को पाता है,
घृणित धर्म यदि ना होता तो, सब कोई ही भ्राता है।
कठिन डगर क्यूँ ईश बनाया, चप्पे-चप्पे में चुनवाया,
क्यों सोना क्यों काँसा है, समझ तनिक ना आता है।
व्याख्या में क्या लिखूँ यहाँ पर, आँख्यां ढूंढें किसे कहाँ पर,
निशदिन नियम भुलाता है, तनिक समझ ना आता है।
मूक वही है इस दुनियाँ में, समय ने जिसको डांटा है,
जिनको थोड़ी छूट मिली है, गीत कोई भी गाता है।
स्नेह है गर्भित अब तुलना से, नेह की विकृति भी तुलना से,
रह जाऊँ या छोड़ चलूँ जग, तनिक समझ ना आता है।
हमने कैसा मार्ग चुना है, कच्चा ना कुछ सभी भुना है,
"मौर्य" कलुष ना धारण करना, लिपि में नहीं समाता है।
२३/०९/२०१४
______________ अंगिरा प्रसाद मौर्या।