मंदिर मस्जिद औ गिरिजाघर, धर्म प्रतिष्ठा है कइयों पर।
किन्तु यहाँ पर कौन है सच्चा, एक को कह दो दूजा बच्चा।
अपनी-अपनी सब गाते हैं, धर्म की तुलना सब करते हैं।
धर्म नहीं है व्यक्ति वो कोई, जिसने अपनी साख हो बोई ।
"धर्म" नेक वह नियम जगत में, जिसकी व्यख्या कर सकते हैं,
परिभाषा में "प्रेम" से बढ़कर, इसकी गाथा लिख सकते हैं।
धर्म की अपनी धुरी रही है, पीड़ा से ये झुकी नहीं है ।
स्वार्थ है इसके दमन का कारक, इसकी निश्चित गली नहीं है।
नर-मादा के अतिरिक्त जगत में, किन्नर ने भी जन्म लिया है।
सुर-नर-मुनि कोई जाति नहीं है, सबने अपना कर्म किया है।
"मौर्य" धर्म तो नहीं है प्राणी, एक एव अस्तित्व है इसका !
मंदिर-मस्जिद उसको न बाँटो, मानवता ही घर हो जिसका ।
०४/१२/२०१५
-------- अंगिरा प्रसाद मौर्य
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