गुरुवार, 31 जुलाई 2014

नारियों का अस्तित्व

पुरुषोदय भी जहाँ हुआ था, वहीँ से नारी उदित हुई है।
ममता की पहचान करे जो, जग में क्यूँ वो मुदित हुई है।

पति का ही भगवान यहाँ पर, पत्नी का भगवान नहीं है।
चरणोदक जो भी पत्नी है, जग में उसका मान नहीं है।

जग का तुम इतिहास उठा लो, नारी ही बस दमित हुई है।
ममता की पहचान करे जो, जग में क्यूँ वो मुदित हुई है।

भांति-भांति की नीति है जग में, सबमे नारी ही बस सहमे।
मनोदशा जो डरी हुई है, क्या कर कपड़े क्यूँ कर गहने।

नारी का अस्तित्व ही देखो, भावुकता को उचित हुई है।
ममता की पहचान करे जो, जग में क्यूँ वो मुदित हुई है।

"मौर्य" प्रश्न प्रति नारी को है, पुरुषों के आभारी को है।
तुम्हरी लिपि लहराती क्यूँ नहिं, पुरुषों पर सरदारी को है।

जग से भी सम्बन्ध तुम्हारा, काम ही तुमपे भारी क्यूँ है।
ममता की पहचान करे जो, सबसे पहली नारी क्यूँ है।

अरे नारियों गुप्त हो जाओ, दर्शन तुम्हरी क्रुद्धित हुई है।
ममता की पहचान करे जो, जग में क्यूँ वो मुदित हुई है।
३१/०७/२०१४
       ~~~~~~~~~ अंगिरा प्रसाद मौर्या।

>>>>>>>जय माँ शारदे<<<<<<<

शनिवार, 26 जुलाई 2014

कारगिल युद्ध बलिदानियों को कोटि कोटि नमन

२६ जुलाई १९९९ अर्थात आज के ही दिनांक में हमने कारगिल विजय प्राप्त कर ली थी। विजय दृढ़ विश्वाश से प्राप्त होता है। सेनाएँ अपने प्राणों की बलि चढ़ाने को तैयार थीं लेकिन पराजय उन्हें स्वीकार नहीं था। वे अपने दृढ़ विश्वास के साथ माँ भारती की रक्षा के लिए अंगारों में कूद पड़े। जय हिन्द की हुंकार करते हुए उन्होंने शत्रुओं को कुचल डाला। वन्दे-मातरम सुनते ही शत्रुओं के हाथ काँपने लगते थे। बहुत से वीरों ने माँ भारती एवं उनके अनन्य पुत्रों के हित हेतु स्वयं का बलिदान कर दिया।

वे वीर भी ऐसे वीर थे कि रक्त लपेटे हुए अंतिम साँस लेने तक वन्दे-मातरम कहते रहे। भारत माँ को सुरक्षित देख उन्हें अस्रु अथवा रोदन नहीं आया। वे हँसते-हँसते बलिदान को प्राप्त हो गए। ऐसे वीरों को स्मरण कर हमे नमन करना चाहिए और हृदय को प्रेरणा देते हुए उसे और भी कड़ा कर लेना चाहिए, भविष्य के लिए।
ऐसे वीरों की वीरगति पर किसी भी भारतीय को अस्रु पूरित अथवा रोना नहीं चाहिए, इससे वीरों का अपमान होता है। उन्होंने अपनी बलि हमे रोने के लिए नहीं हँसने के लिए दी है।

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वीरों तुम्हें नमन करता हूँ,
चेत तुम्हें ही गगन भरता हूँ,
बलि को नहीं सहन करता हूँ,
मार्ग तुम्हारे नित चलता हूँ।

राष्ट्र-पूज्य के अधिकारी तुम,
राष्ट्र-ध्वजा के सहकारी तुम,
तुम ही भारत अधिकारी हो,
अनुपस्थिति-रुदन करता हूँ।

तुमने हम को खुशी दिया है,
हम तुमको क्या दे पाएँगे,
और नहीं कुछ मेरे बस में,
तुम्हें सतत नमन करता हूँ।

फिर आओ तुम वो विश्वासी,
साथ चलें हम भारतवासी,
पाक औ चीन ख़तम करना है,
पुनः उपज दमन करना है।

हमे नहीं एक क्षण की चिंता,
भारत-हृदय हमे बनना है,
फिर आओ तुम वो विश्वासी,
पुनः उपज दमन करना है।

"मौर्य" तुम्हारे साथ चलेंगे,
पहले अपने प्राण तजेंगे,
ऋण पूरा हमको करना है,
भारत-हृदय हमे बनना है।

यादों का मैं खनन करता हूँ,
अपवादों का दहन करता हूँ,
हमें सुरक्षित करने वालों,
तुम्हें सतत नमन करता हूँ,

नहीं कलम रोता है मेरा,
गर्व सदा अनुभव करता है,
भारतवीर कथाएँ लिखकर,
"मौर्य" सदा हँसकर रहता है।

देखा जग में राज्य बहुत मैं,
भारत जैसा राज्य नहीं है,
देश को अपनी माता कहते,
कहीं पे ऐसा साज्य नहीं है।

तुम्हें हृदय में मैं रखता हूँ,
सबमे तुम्हें चयन करता हूँ,
भारत माँ के वो रखवालों,
तुम्हें सतत नमन करता हूँ।
२६/०७/२०१४
   ~~~~~~~~~ अंगिरा प्रसाद मौर्या ।

!!*!! जय हिन्द !!*!! जय भारत !!*!!

शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

शुभ प्रभात

रात गई हो नव-संसार,
खुशियों के हों नव-आसार,
नई चलो फिर बात करें हम,
मिलकर शुभ-प्रभात करें हम।

कल जो था वो बीत गया अब,
सूरज देखो प्रीत नया अब,
कल भी हो जमकर उजियारा,
उठो स्नेहियों शीत गया अब।

हम जागे तो जग जागेगा,
हम भागे तो जग भागेगा,
हमे नहीं कायर है बनना,
भारत दुनियाँ का है गहना।

सभी दिलों में राज करें हम,
सभी सुरों को ताज करें हम,
नई चलो फिर बात करें हम,
मिलकर शुभ-प्रभात करें हम।
२५/०७/२०१४
   ~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या।

गुरुवार, 24 जुलाई 2014

भाव और शब्द

भावों का कोई शब्द नहीं है,
भाव सदा निःशब्द रहा है,
शब्दों में जो उदित यहाँ पर,
मनमानी प्रतिबद्ध रहा है।

भाव हृदय को पा जाता है,
भाव हृदय में छा जाता है,
शब्दों में जो विखरित होता,
कभी वो मन को खा जाता है।

शब्दों का कोई मूल नहीं है,
अगणित जग में भाषा जो है,
एक यहाँ उल्लास का कारक,
एक के लिए निराशा को है।

भाव अहम है इस दुनियाँ में,
बाकी सबकुछ रद्द रहा है,
शब्दों में जो उदित यहाँ पर,
मनमानी प्रतिबद्ध रहा है।

सकल भाव दर्शा जाता है,
किरण वही दिखला जाता है,
"मौर्य" तुम्हारे जो अंतर में,
चहुँ आवेश समा जाता है।

मुखरित जो शब्दों में होता,
छल को गले लगा जाता है,
सत्य जहाँ में जिसने पाया,
मौन तले वो आ जाता है।

भाव जहाँ में जैसा पनपा,
वहाँ पे वैसा हद्द रहा है,
शब्दों में जो उदित यहाँ पर,
मनमानी प्रतिबद्ध रहा है।
२४/०७/२०१४
~~~~~~~~~ अंगिरा प्रसाद मौर्या

शनिवार, 19 जुलाई 2014

भारत बनाम शिक्षा

कट्टर दुश्मन थे रोगों के,
आज वही बीमार बने हैं,
हमने जग को शिक्षा क्या दी,
आज हम्हीं दीवार बने हैं।

डॉक्टर यहाँ उपाधि बड़ी है,
पंडित मानों व्याधि पड़ी है,
वैद्यालय अब मेडिकल होता,
पतन यहीं से बड़ी कड़ी है।

सुना है पंडित जाति है कोई,
दिन में भी रहते हैं सोई,
शिक्षा बस अधिकार है उसका,
पुत्र ही उनका पंडित होई।

शिक्षक देखो बड़े निराले,
स्वेत है बाहर अंतर काले,
अंग्रजों की माला जपते,
खोज पे उनके लगे हैं ताले।

कैसे भारत कहूँ अवस्था,
प्रचलित है जो गैर व्यवस्था,
तुच्छ जहाँ में सोच है जिनकी,
वृद्ध नहीं वो युवावस्था।

"मौर्य" उन्होंने ने ममता बेचा,
हम भी तो इज्जत ही बेचे,
मॉम औ माँ में कहाँ है अंतर,
धन-दौलत का बड़ा ये पेसा।

धन निर्धारित नहीं है जीवन,
जीवन ये निर्धारित करता,
यही कृष्ण की कौतुक बातें,
"मौर्य" अभी तक नहीं समझता।
   ~~~ जय श्री कृष्ण ~~~
१९/०७/२०१४
             ~~~ अंगिरा प्रसाद मौर्या।

!!*!! जय हिन्द !!*!! जय भारत !!*!!

गुरुवार, 17 जुलाई 2014

कलम हमारी तोप से बढ़कर


कलम हमारी तोप से बढ़कर,
कभी नरम तो कभी अकड़कर,
मन की मेरे लिख जाती है,
दुनियाँ में कुछ कह जाती है।

कभी दुखों को ये दर्शाती,
कभी हास्यमय चित्र बनाती,
कभी अँधेरों में भी आकर,
नई सुबह ये दे जाती है।

कभी प्रेम पर लिखती है ये,
कभी घृणा को दर्शाती है,
कभी हिन्द का चित्रण करके,
दुनियाँ को कुछ कह जाती है।

बस एक नहीं इसके बस में है,
दुनियाँ के जो नस-नस में है,
"मौर्य" लिखित में नहीं जो आता,
बातें उसकी कह जाती है।

समाचार भी ये लाती है,
दुराचार भी फैलाती है,
"मौर्य" पढ़े जो जिन नजरों से,
उसको वो सब दे जाती है।

माना की जग कठिन डगर है,
फिर भी इसमें भाव अमर है,
सदियों तक ये रह जाती है,
दुनियाँ में कुछ कह जाती है।
०९/०४/२०१४
              ~~~ अंगिरा प्रसाद मौर्या ।
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बुधवार, 16 जुलाई 2014

प्रेम

भावनाओं में उदय है जिसका,
भावनाओं में ही विलीन होता है,
प्रेम जहाँ में वस्तु है ऐसी,
जो कभी ना मलीन होता है।

घृणा ही पड़ाव है जिसका,
पुनः जो रंगीन होता होता है,
प्रेम जहाँ में वस्तु है ऐसी,
जो कभी ना मलीन होता है।

आरोपों को ढोते फिरता है कोई,
मानो वो बहुत ही संगीन होता है,
प्रेम की सत्ता ही कहाँ उसमे,
जो आरोपों में ही लीन होता है।

प्रेम तो भाव-प्रेषण है,
अग्रेषण तो विहीन होता है,
"मौर्य" मरता वही है इसमें,
जो पदार्थों में लीन होता है।

प्रेम ही वो पूण्य है,
जहाँ शून्य भी हीन होता है,
प्रेम जहाँ में वस्तु है ऐसी,
जो कभी ना मलीन होता है।
१६/०७/२०१४
~~~~~~~ अंगिरा प्रसाद मौर्या।
      ***जय माँ शारदे***

मंगलवार, 15 जुलाई 2014

सावधान ! जेहादियों !!!!

कोई जले न जले, पर मैं जलता हूँ,
कोई चले न चले, पर मैं चलता हूँ,
सूरज ढले न ढले,पर मैं ढलता हूँ,
रात थमे न थमे, पर मै निकलता हूँ।

कोई जमे न जमे, पर मैं जमता हूँ,
कोई रमे न रमे, पर मैं रमता हूँ,
लोग कहें न कहें, पर मैं कहता हूँ,
चंद व्यंग ही सही, पर मैं सहता हूँ।

दरिया बहे न बहे, पर मैं बहता हूँ,
माता के वचनों पर, स्थिर मैं रहता हूँ,
सावधान जेहादियों ! संकल्प ले कहता हूँ!
किसी कटघरे में नहीं, बस गोद में रहता हूँ।

कोई रहे न रहे, पर मैं रहता हूँ,
प्रण भी करता हूँ, प्राण भी हरता हूँ,
मैं भारत हूँ, "मौर्य" भरता हूँ,
मैं हिन्द हूँ ! मैं शेर हूँ ! नहीं डरता हूँ।

     ~~~ अंगिरा प्रसाद मौर्या।

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"मौर्य" यहाँ हुंकार भरे जब, खून नदियाँ बह जाएँगी।
नापाक गुटों कश्मीर-विरोधी, बहुएँ-विधवा हो जाएँगी।
~~~~~~~~~APM

!!*!! जय हिन्द !!*!! जय भारत !!*!!

१५/०७/२०१४