भावों का कोई शब्द नहीं है,
भाव सदा निःशब्द रहा है,
शब्दों में जो उदित यहाँ पर,
मनमानी प्रतिबद्ध रहा है।
भाव हृदय को पा जाता है,
भाव हृदय में छा जाता है,
शब्दों में जो विखरित होता,
कभी वो मन को खा जाता है।
शब्दों का कोई मूल नहीं है,
अगणित जग में भाषा जो है,
एक यहाँ उल्लास का कारक,
एक के लिए निराशा को है।
भाव अहम है इस दुनियाँ में,
बाकी सबकुछ रद्द रहा है,
शब्दों में जो उदित यहाँ पर,
मनमानी प्रतिबद्ध रहा है।
सकल भाव दर्शा जाता है,
किरण वही दिखला जाता है,
"मौर्य" तुम्हारे जो अंतर में,
चहुँ आवेश समा जाता है।
मुखरित जो शब्दों में होता,
छल को गले लगा जाता है,
सत्य जहाँ में जिसने पाया,
मौन तले वो आ जाता है।
भाव जहाँ में जैसा पनपा,
वहाँ पे वैसा हद्द रहा है,
शब्दों में जो उदित यहाँ पर,
मनमानी प्रतिबद्ध रहा है।
२४/०७/२०१४
~~~~~~~~~ अंगिरा प्रसाद मौर्या
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