गुरुवार, 17 जुलाई 2014

कलम हमारी तोप से बढ़कर


कलम हमारी तोप से बढ़कर,
कभी नरम तो कभी अकड़कर,
मन की मेरे लिख जाती है,
दुनियाँ में कुछ कह जाती है।

कभी दुखों को ये दर्शाती,
कभी हास्यमय चित्र बनाती,
कभी अँधेरों में भी आकर,
नई सुबह ये दे जाती है।

कभी प्रेम पर लिखती है ये,
कभी घृणा को दर्शाती है,
कभी हिन्द का चित्रण करके,
दुनियाँ को कुछ कह जाती है।

बस एक नहीं इसके बस में है,
दुनियाँ के जो नस-नस में है,
"मौर्य" लिखित में नहीं जो आता,
बातें उसकी कह जाती है।

समाचार भी ये लाती है,
दुराचार भी फैलाती है,
"मौर्य" पढ़े जो जिन नजरों से,
उसको वो सब दे जाती है।

माना की जग कठिन डगर है,
फिर भी इसमें भाव अमर है,
सदियों तक ये रह जाती है,
दुनियाँ में कुछ कह जाती है।
०९/०४/२०१४
              ~~~ अंगिरा प्रसाद मौर्या ।
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