भावनाओं में उदय है जिसका,
भावनाओं में ही विलीन होता है,
प्रेम जहाँ में वस्तु है ऐसी,
जो कभी ना मलीन होता है।
घृणा ही पड़ाव है जिसका,
पुनः जो रंगीन होता होता है,
प्रेम जहाँ में वस्तु है ऐसी,
जो कभी ना मलीन होता है।
आरोपों को ढोते फिरता है कोई,
मानो वो बहुत ही संगीन होता है,
प्रेम की सत्ता ही कहाँ उसमे,
जो आरोपों में ही लीन होता है।
प्रेम तो भाव-प्रेषण है,
अग्रेषण तो विहीन होता है,
"मौर्य" मरता वही है इसमें,
जो पदार्थों में लीन होता है।
प्रेम ही वो पूण्य है,
जहाँ शून्य भी हीन होता है,
प्रेम जहाँ में वस्तु है ऐसी,
जो कभी ना मलीन होता है।
१६/०७/२०१४
~~~~~~~ अंगिरा प्रसाद मौर्या।
***जय माँ शारदे***
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
कृपया अपनी छवि स्वयं न ख़राब करें /-
अभद्र टिप्पणियों से बचें /-