रविवार, 12 अप्रैल 2015

अंधूरापन और मन की कुछ अनकही अनसुनी बातें

अँधूरापन अंधूरापन,
नहीं है ये कोई जीवन।
मेरे तुम साथ में आओ,
बनालो तुम मुझे दर्पण।

तुम्हारी हर चहक को मैं,
महकने को बदल दूँगा।
तुम्हारे मन्नतें जो हैं,
उन्हें अपनी मैं कर लूँगा।

सुनो एक बात मेरी तो,
ये सूना है मेरा आँगन।
मेरे तुम साथ में आओ,
बनालो तुम मुझे दर्पण।

बहुत तुम खूबसूरत हो,
अदा हर एक प्यारी है।
इन आँखों में समंदर है,
लहर सबसे ही न्यारी है।

तूफानों को न उकसाओ,
यौवन ये आयु छोटी है।
तुम्हारा मन जो प्यासा है,
ये दुनियाँ भी तो खोटी है।

तुम्हें विश्वास जो मेरा,
तो कर दो आज ही अर्पण।
मेरे तुम साथ में आओ,
बनालो तुम मुझे दर्पण।
              ।। 07/01/2015 ।।
~~~~~~~~~ अंगिरा प्रसाद मौर्य।

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