गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

प्रेम


भाँति-भाँति मर्यादा जिसमे, जग में जिसका सार नहीं है,
प्रेम डगरिया बड़ी कठिन है, जग में इसका पार नहीं है ।

प्रेम हृदय में ही खिलता है, इसका इक आकार नहीं है,
भाँति- भाँति के रूप हैं इसके, इसका कोई पार नहीं है।

प्रेम पुत्र से ऐसा होता, स्नेह कभी फटकार कहीं है,
स्नेह है ममता का आभूषण, पितु की मर्यादा हार वहीँ है।

प्रेम है जिद में नहीं पनपता, क्रोध ही  जिसका तार कहीं है,
आशा की इक नई किरण ये, जहाँ भक्त भगवान वहीँ है।

प्रेम रंग कुछ ऐसा होता, स्वेच्छा है बलिदान कहीं है,
प्रेम उदित ममता से होता, पीड़ा का जहँ पार नहीं है।

"मौर्य" वस्तु में नहीं प्रेम है, बुद्धि में इसका वास नहीं है,
प्रेम ह्रदय का आभूषण है, ईश में जिसका तार कहीं है।
………जय माँ शारदे………
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
~~~~~~~~~APM
दिनाँक:- २७/०२/२०१४
*******
कुछ शाब्दिक अर्थ:-

हार= गौरव रूपी माला, मर्यादा के बाहर जाने पर जिसके चलते डांट, फटकार भी पड़ती है।

ममता= मुहब्बत, मुहब्बत इश्क नहीं है इश्क में तो जिद है, जो कि मुहब्बत में नहीं होती हमारे मुताबिक।

तार= तार का अर्थ संयोग(connection) रूपी माध्यम से है।
यहाँ पर "ईश में जिसका तार कहीं है" वाक्य अत्यंत महत्वपूर्ण है। जिसका आशय है, "हृदय आत्मा से जुड़ा है और आत्मा परमात्मा(ईश,ईश्वर) से।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

कृपया अपनी छवि स्वयं न ख़राब करें /-
अभद्र टिप्पणियों से बचें /-