उचित और अनुचित एक दूसरे के परस्पर उलटे हैं। अर्थात ये एक दूसरे के विलोम शब्द हैं।
उचित:- कोई भी वस्तु या वाणी वहाँ उपयोग करना जहाँ उसका मुल्य हो ।
अनुचित:- कोई भी वस्तु या वाणी कभी भी कहीं भी उपयोग कर देना।
उचित और अनुचित पर प्रायः विद्वान लोग ही ध्यान देते हैं। इनके उचित एवं अनुचित इनके वेद-ग्रंथों द्वारा निर्धारित होते हैं। यहाँ उचित को "सुचारू" एवं अनुचित को "गलती" या "त्रुटी" भी कह सकते हैं। अब आप विद्वान का तात्पर्य तो समझ ही गए होंगे कि जो ज्ञानवान भी होता है। यद्यपि विद्या एवं ज्ञान में भी अंतर है ।
और जो विद्वान नहीं होते तथा बुद्धिमान एवं शक्तिशाली होते हैं, वे अपनी इच्छानुसार उचित और अनुचित का चुनाव कर लेते हैं परन्तु उसपर अटल भी रहते हैं।
इसी तरह जो भ्रमित बुद्धि वाला एवं शक्तिशाली होते हैं। वे अपनी प्रति/इच्छाओं को ही उचित मानते हैं। एवं उनके विरुद्ध जो भी हो सब अनुचित।
अब इसमें भी कई प्रकार हैं! जिनमे से हम कुछ प्रकारों का वर्णन करेंगे।
जैसे व्योहार कुशल व्यक्ति:-
हम जानते हैं की इस संसार में प्रत्येक प्राणी के पास प्रत्येक वस्तुएँ पुर्णतः नहीं होती हैं। कुछ पूर्ण होती हैं तो कुछ आंशिक मात्रा में परन्तु होती सब हैं। इसी तरह आप देखेंगे की किसी किसी व्यक्ति के पास ऐसी हुनर होती है की राह चलते चलते व्योहार स्थापित करते रहता है। इसे व्योहार कुशलता कहते हैं तथा ऐसे व्यक्ति व्योहार कुशल कहे जाते हैं। अब आप इन्हें यदि अपने दृष्टिकोण से देखेंगे तो आपको इनके अन्दर बहुत सारे अनुचितता मिलेगी। परन्तु वही उनके लिए उचित होता है। प्रायः इस संसार में उचित और अनुचित में ऐसा भी ज्यादातर भेद रहा है और रहेगा भी।
और जो व्योहार कुशल व्यक्ति होते हैं वे कोई बहुत ज्यादा ज्ञानी या बुद्धिमान भी नहीं होते। उनके अन्दर अकेलेपन की हमेशा एक प्रकार से डर छुपी रहती है। उनका मन हमेशा किसी न किसी का समर्थन चाहता है। इसी समर्थन और अकेलेपन को दूर करने की आस में अक्सर वे दूसरे का समर्थन करने को तत्पर रहते हैं। अब वह समर्थन वह किसे और क्यों दे रहे हैं इसका उन्हें जरा भी ज्ञान नहीं रहता जब वह अपने आप को अकेला महसूस करने लगते हैं। अर्थात ये तो शायद ही उचित और अनुचित का ध्यान देते हैं।
प्रशंगत: ------
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