बुधवार, 22 जनवरी 2014

सुविचार


सादर नमन ! स्वजनों
जय श्री राधेश्याम
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स्वजनों ! अगली पोस्ट पोस्ट द्वारा यह सिद्ध हो चुका है की नित्य योग्य एवं उत्तम फल मीठे ही क्यों होते हैं?

आज का तात्पर्य भी वहीँ से शुरु करते है।

प्रेम से बोलो श्री राधेश्याम की ((((((!)))))))
!!*!! जय!!*!!
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चूँकि संसार की प्रत्येक वस्तुएँ ईश्वर द्वारा प्रदत्त हैं,हम एवं हमारी इन्द्रियाँ भी। ईश्वर के किसी भी वस्तु को अकारण क्षति ना पहुँचे तथा नित्य-योग्य फल देने वाले जीव(पेडों) से किसी को द्वेष ना हो। इसलिए नित्य-योग्य एवं उत्तम फल मीठे होते है।

आशय:- इसी में ईश्वर का एक संदेश भी छुपा या व्याप्त है कि " हमें भी मीठे ही बनना चाहिए"। अर्थात मृदु स्वर वाला, समाज कल्याण पर विचार करने वाला(नित्य-योग्य), परोपकार करना(उत्तम कोटि)।

आप ऐसे भी अनुभव कर सकते हैं या देख सकते हैं कि "जो ईश्वर भक्त होते हैं वे मीठे ही होते हैं"।क्योंकि वो ईश्वर में स्थित होने के कारण ईश्वर का उद्देश्य समझते हैं।

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