कभी कभी पल ऐसा आ जाता है,
खुशहाल-जिंदगी झुठला जाता है,
है कभी कभी वह वक्त भी आता,
परेसाँ-जिंदगी को धुंधला जाता है।।
बनना चाहूँ चाँद के जैसा,
घना-अँधेरा भी सरमा जाता है,
खुश रहकर करता उजियाला,
पक्ष भी दूजा आ जाता है।।
कभी कभी......... धुंधला जाता है।।
बनना चाहूँ सूर्य के जैसा,
उजियाला जिससे छा जाता है,
इतने में फिर आती संध्या,
जब रात्रि-अँधेरा मौका पाता है।।
कभी कभी......... धुंधला जाता है।।
सत्य-सहारे चलते हैं हम,
सच है की डगमगा जाता है,
"मौर्य" चलूँगा सत्य के पथ पर,
जहँ छेद कभी ना हो पाता है।।
कभी कभी......... धुधला जाता है।।
दिन होता है,है रात भी होनी,
प्राणी इससे अनुभव पाता है,
अस्तित्व नहीं है अंधकार का,
प्रकाश कहाँ ये ढक पाता है।।
कभी कभी......... धुंधला जाता है।।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
~~~~~~~~~APM
दिनांक:- २६/०९/२०१३
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