चलते चलते राहों में रुकने की आदत हुई थी,
तेरी ख्वाहिस ही ना थी कि तेरी चाहत हुई थी।।
तेरे लबों पे कलियाँ जो खिलने लगी थी,
मेरी यादों से हरपल तू मिलने लगी थी,
जान के भी नादाँ नज़रे बहकनेे लगी थी,
सोचा बहुत फिर भी खुद से सिकायत हुई थी,
तेरी ख्वाहिस ही ना थी कि तेरी चाहत हुई थी।।
कुसूर किसका ये राम जाने,
हम तो हुए थे नए दीवाने,
तमन्ना थी दिल कब तू जाने,
की हमें तेरे जैसी ही एक रोग भयानक हुई थी,
तेरी ख्वाहिस ही ना थी की तेरी चाहत हुई थी।।
आज फिरता हूँ गलियों में बनके आँवारा,
की तेरा साथ छूटे ये ना था गँवारा,
तेरी उम्मीद में ख्वाब बुनते थे अक्सर,
तेरे बिना मेरे साथ तेरे रहने की आहट हुई थी
तेरी ख्वाहिस ही ना थी की तेरी चाहत हुई थी।।
चलते चलते राहों में रुकने की आदत हुई थी,
तेरी ख्वाहिस ही ना थी की तेरी चाहत हुई थी।।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
~~~~~~~~~APM
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