फिर देखो आई ये संध्या ,
बाण मोहनी चलाई ये संध्या,
भरी जूनून में अति ये संध्या,
मित्र-बंधु को मेरा शुभ-संध्या।।
हो सर्दी गर्मी या वर्षा का मौसम,
बन्धनों उलझनों में कितने भी हों हम,
हो चंद पलों का या वर्षों का गम,
चंद-दृश्य में हो जाते हैं सब नम।।
फिर...................शुभ-संध्या।
मुझे तो अपना गीत सुनाती,
मानों खुद मन-मीत बताती,
कुछ भी हो प्रतिपल इतराती,
मधुर हवांएं लहराती है संध्या।।
फिर देखो आई ये संध्या,
बाण मोहनी चलाई ये संध्या,
भरी जूनून में अति ये संध्या,
मित्र-बंधु को मेरा शुभ-संध्या।।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
~~~~~~~~~ Angira Prasad Maurya
~~~~~~~~~APM
>>>>>>>जय श्री कृष्णा<<<<<<<
अति सुन्दर रचना
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हटाएंआभार
हटाएंअति उत्तम।
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