दहेज का किसने प्रथा बनाई,
किसने इसकी की सुनवाई,
जान हजारों जब खतरे में,
देते ना क्यूँ तुम ठुकराई।
एक ठुकराए जग ठुकराए,
ये तो एक व्योहार बड़ा है,
तुमने माँगा जग ने माँगा,
यह इसके आधार पड़ा है।
कोई कहे ये पुत्र की ख्वाहिश,
इसमें हमरी दखल नहीं है,
अरे मूर्खों क्यूँ नहीं कहते,
भिक्षा दो हम सबल नहीं हैं।
एक ही सुर में अब सब गाओ,
क्रांति दहेज़-मुक्ति की लाओ,
भारत में अब ऐसा नारा,
जन-जन ही दिन रात लगाओ।
"मौर्य" प्रतिज्ञा ऐसी कर लो,
देश-प्रेम कण-कण में भर लो,
भारत का संसार सुखी हो,
प्रीति को ऐसी निर्झर कर दो।
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~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
दिनाँक_________१२/०४/२०१४
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!!*!!जय हिन्द!!*!!
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