शनिवार, 7 जून 2014

तुम्हें मैं ढूँढता हर पल

मुझे अपनी फिकर देदो,
मुझे अपनी जिकर देदो,
तुम्हें मैं ढूँढता हर पल,
मुझे अपनी खबर देदो।

नहीं मैं हुश्न का मारा,
नहीं मैं इश्क को प्यारा,
नहीं मैं जानता कुछ भी,
कि तुम पर क्यूँ है दिलहारा।

मैं सूरज क्यूँ यहाँ पर हूँ,
यहाँ की चांदनी तुम क्यूँ!
नहीं जब मैं यहाँ रहता,
यहाँ की रौशनी तुम क्यूँ ?

अंधूरा काम जो मेरा,
वो पूरा तुम से होता है।
मुझे तुम क्यूँ नहीं मिलती !
सबेरा जब भी होता है।

सरल हर प्रश्न हैं मेरे,
इन्हें अपनी नजर देदो,
तुम्हें मैं ढूँढता हर पल,
मुझे अपनी खबर देदो।
       ~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्य।
(प्रेम जगत पर सर्वप्रथम प्रकाशित)

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