शनिवार, 7 जून 2014

आस का बसेरा हो जो, हर दिन एक सवेरा है

रोज ही उजाला होता, कब यहाँ अँधेरा है,
आस का बसेरा हो जो, हर दिन एक सवेरा है,

कैसा नया साल किसका, बात का बखेड़ा है,
आस का बसेरा हो जो,हर दिन एक सवेरा है,

उसने है पाया सब कुछ, जिसका कोई घेरा है,
आस का बसेरा हो जो, हर दिन एक सवेरा है।

आस है असीमित अपनी, इसलिए तो बेराह है,
आस का बसेरा हो जो, हर दिन एक सवेरा है।

भूख भी तभी आती है, इसका एक असेरा है,
आस का बसेरा हो जो हर दिन एक सवेरा है।

~~~~~~~~~ अंगिरा प्रसाद मौर्य ।

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