अक्सर वे अपने ना होते, जो अपने हैं रोज बताते,
मात-पिता ही बस अपने हैं, दुख में भी उम्मीद जागते।
कैसी-कैसी छाया देखी, जैसी-तैसी माया देखी,
गुणवानों में अवगुण देखी, प्रीत है झूठी सुन्दर लेखी।
छल उनका कुछ रोज नया है, कपट करन को प्रेम बयाँ है,
नीति की ऐसी व्याख्या करते, क्यूँ मानूं मैं लाज-हया है।
"मौर्य" अडिग हैं अपने मत पर, चन्दन तो चन्दन ही होते,
विष-छाया में उनका जीवन, फिर भी विष को वो ना बोते।
देखी दुनियाँ में अजब कहानी, बीता बचपन मिली जवानी,
माँ-बाप को धक्का जो खड्डे में, बूझे निशदिन नई रवानी,
नई रवानी नौ दिन की है, क्यूँ लिपि को तुम खाक बनाओ,
राह पकड़ के वही चलो तुम, जो बच्चों को मार्ग बताओ।
सेवा जो माँ-बाप का करते, अपना जीवन धन्य बनाते,
"मौर्य" बीज जिसका जो बोये, निश्चय फसल वही हैं पाते।
_______ जय माँ शारदे _______
~~~~~~~~~ अंगिरा प्रसाद मौर्या
दिनाँक___ ०७/०६/२०१४
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