कहाँ कहाँ तक जाऊँ मैं भी, चलते चलते थक जाता हूँ।
नहीं मुड़ुँगा अपने पथ से, खुद से खुद में कह जाता हूँ।
एक दिन आँधी आयी थी यँह, बाकी अब तूफान यहाँ है।
अपने पथ को छोडूंगा नहिं, इतना तो अभिमान भरा है।
संघर्ष समर्पित जीवन मेरा, भले अभी अपमान जनक है।
मंजिल जिस दिन पा जाऊंगा, "मौर्य" यहाँ सम्मान जनक है।
देख हमारी मर्यादा को, खिल्ली निशदिन लोग उड़ाते।
हरिश्चंद की उपमा देकर, मस्ती की तस्वीर बनाते।
फिर भी करता मै सुख का अनुभव, एक पल कोई हँस पाता है।
हम तो अपने मार्ग-प्रखर हैं, इसमें अपना क्या जाता है।
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