हे त्रिपुरारी हे कैलाशी, कण-कण में प्रभु तुम वासी हो।
तुम जग-हन्ता तुम्हीं नियंता, सृष्टि-जगत में अविनासी हो।
भक्तों के तुम भोले-भाले, ना तुम जानो गोरे-काले,
शरण तुम्हारे जो भी आता, मोक्ष परमपद वह है पाता,
मैं शरणागत प्रभु दास तुम्हारा, यहाँ हमारा नहीं गुजारा,
तुम्ही सुझाओ मार्ग हमें अब, नमन करूँ मै बारम्बारा,
हम सब तो संतान तुम्हारे, जगतपिता तुम सबसे न्यारे,
काम-क्रोध वस रुकना पड़ता, वहाँ से हमको कौन उबारे,
अब दीन-दुखी को कौन दुहाई, तुम्ही तो हमरे हितकारी हो।
तुम जग-हन्ता तुम्ही नियंता, सृष्टि-जगत में अविनाशी हो।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
दिनाँक:-२४/०३/२०१४
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