उम्र निकल जाता है,
धन-धान्य यहीं रह जाता है।
कर्म फल को स्वीकारो मन से,
औरों के कपड़ा भी उतारो तन से,
आने वाली पीढियां पछताती हैं,
गर मारा हुआ धन वो खाती हैं।
आलीशान महल भी केवल नाम का,
जब व्यक्ति ही नहीं सम्मान का !
दुर्योधन का हस्तिनापुर भी हो गया खण्डहर,
उच्च आकांक्षाओं के सपने देखा बुन-बुनकर।
हर युग मे होता समय का चाल प्रबल,
ऐ प्राणी जरा धीरे और संभल के चल।
एक डाली से हजारों माचिस तीलियाँ बनते,
एक तीली के सुलगने पर कई बगीचे जलते।
ऐ प्राणी जरा धीरे और संभल के चल।
हर युग में है समय का जाल प्रबल।
अंगिरा प्रसाद मौर्य।
15/09/2019
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