कलम! कमल बन जा तू मेरी,
कीचड़ में भी खिल जाना तुम,
कभी अकेला मैं पड़ जाऊँ,
आके मुझको मिल जाना तुम।
देख जरा दरिया के लहरें,
वन-उपवन के भेद सुनहरे,
कहता क्या अम्बर है हमसे,
अपने मत से बतलाना तुम।
प्रकृति कैसी है अलबेली,
होती कब ये नयी नवेली,
ऋतु-मौसम की आँख मिचोली,
इन पर खूब प्रखर आना तुम।
जीवन में संघर्ष जरूरी,
इच्छाएं क्यूँ रहें अधूरी,
सुख-दुख में है कितनी दूरी,
एक खबरिया ये लाना तुम।
रूठ कभी कोई हमसे जाए,
माने ना वो लाख मनाये,
क्षण-तक्षण को गम उपराए,
गमों को मेरे सिल जाना तुम।
कभी अकेला मैं पड़ जाऊँ!
आके मुझको मिल जाना तुम।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
दिनाँक:- ०९/०४/२०१४
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