बुधवार, 9 अप्रैल 2014

कलम! कमल बन जा तू मेरी

कलम! कमल बन जा तू मेरी,
कीचड़ में भी खिल जाना तुम,
कभी अकेला मैं पड़ जाऊँ,
आके मुझको मिल जाना तुम।

देख जरा दरिया के लहरें,
वन-उपवन के भेद सुनहरे,
कहता क्या अम्बर है हमसे,
अपने मत से बतलाना तुम।

प्रकृति कैसी है अलबेली,
होती कब ये नयी नवेली,
ऋतु-मौसम की आँख मिचोली,
इन पर खूब प्रखर आना तुम।

जीवन में संघर्ष जरूरी,
इच्छाएं क्यूँ रहें अधूरी,
सुख-दुख में है कितनी दूरी,
एक खबरिया ये लाना तुम।

रूठ कभी कोई हमसे जाए,
माने ना वो लाख मनाये,
क्षण-तक्षण को गम उपराए,
गमों को मेरे सिल जाना तुम।
कभी अकेला मैं पड़ जाऊँ!
आके मुझको मिल जाना तुम।

~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
दिनाँक:- ०९/०४/२०१४

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