रविवार, 7 दिसंबर 2014

प्रेम जगत २

प्रेम का बंधन सबसे नाजुक,
घूँट प्रेम का बहुत कड़ा है,
पाके इसको बन गया कोई,
और कोई वीरान खड़ा है।

दीवाल नहीं देखा है इसमें ,
छत इसका पर बहुत बड़ा है,
नींव प्रेम की होती अद्भुत,
स्थान मध्य में बहुत बड़ा है।

पार किया है जिसने इसको,
नाम ही उसका कृष्ण पड़ा है।
विचलित हो गया जो भी इसमें,
वह देखो बर्बाद पड़ा है।

"मौर्य" प्रेम है नहीं समर्पण,
कौन है किसको ढो पायेगा,
प्रेम प्रेमियों से है जन्मा,
कौन अकेला रो पायेगा।

एक एव है भक्ति समर्पण,
जहाँ कोई भगवान बड़ा है,
सौर्यवान है सूर्यमान है,
महाशक्ति का पुंज गढ़ा है।

प्रतिव्यक्ति ही होता महाशक्ति यदि,
कौन है जग में प्रेम जो करता,
चंद-शक्ति है जिसने पाया,
अपने हवसों को नित भरता।

प्रेम है आशा का आभूषण,
जीवन जिसका बहुत बड़ा है,
पाके इसको बन गया कोई,
और कोई बर्बाद पड़ा है।
             ***
                   --- अंगिरा प्रसाद मौर्या।
दिनाँक :-१६/११/२०१४

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कुछ शाब्दिक अर्थ :-
कृष्ण = अमर, कभी न मरने वाला अथवा जिसकी स्मृतियाँ कभी न भुलाई जा सकें।

मध्य-स्थान= नींव और छत के बीच का स्थान।

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